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इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य

इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य

आपके बच्चे का सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने के लिए इन्वेस्टमेंट ऑप्शन्स

क्वालिटी शिक्षा का खर्चा अधिक है। विदेश में शिक्षा अधिकांश माता-पिता की पहुंच से बाहर है। उनके पास बैंकों से शिक्षा ऋण लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और उनके बच्चों को लोन अमाउंट चुकाने के लौंग टर्म दायित्व के साथ, उच्च इंटरेस्ट रेट का भुगतान भी करना पड़ता है।

इन सब कारणों से, समय रहते, आप अपने बच्चों की सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने के लिए इन्वेस्टमेंट करें। कहाँ करें, कैसे करें, कब करें और किसमे इन्वेस्ट करें? ये सरे प्रसन आपके मन में आना स्वाभाविक है। इन्ही सरे प्रश्नों के जबाब आपके लिए यहाँ प्रस्तुत है।

इन्वेस्टमेंट कब शुरू करना चाहिए?

आपके बच्चे की उम्र यह तय करने में भूमिका निभाती है कि आपको कब इन्वेस्ट करना शुरू करना चाहिए। जब आपका बच्चा स्कूल जाना शुरू करता है और तब आप इन्वेस्ट करना शुरू करते हैं, तो बहुत कुछ हासिल होता है। जल्दी शुरू करने से आपको कम इन्वेस्टमेंट करने का फायदा मिलता है। यह आपको बचत करने के लिए अधिक समय, अधिक रिस्क लेने की क्षमता और कम्पाउंडिंग के लाभ भी देता है। जैसे-जैसे आपका बच्चा बड़ा होता है, ये लाभ कम होते जाते हैं।

आपके बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ओप्शन्स:

अपने बच्चे की उम्र को ध्यान में रखते हुए, आप अपने इन्वेस्टमेंट की योजना कैसे बना सकते हैं, इसकी टाइम टेस्टेड और इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य प्रूव किये गए रणनीतियाँ हैं, जिनके द्वारा आप एक अपने बचत के पैसे से अच्छा रिटर्न हासिल कर सकते हैं।

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सुकन्या समृद्धि योजना (SSY)

यह बेटियों के लिए एक डिपाजिट स्कीम है, जिसे सरकार के ‘सेव द गर्ल चाइल्ड, टीच द गर्ल चाइल्ड’ (बेटी बचाओ, बेटी पढाओ) अभियान के रूप में शुरू किया गया है। सुकन्या समृद्धि योजना का खाता लड़की के जन्म के बाद 10 साल की उम्र तक किसी भी समय खोला जा सकता है। इसे किसी भी डाकघर या कमर्शियल बैंकों की एप्रूव्ड ब्रांचेस में खोला जा सकता है। खाता खुलने की तारीख से 21 साल तक, या जब तक लड़की शादी करने का फैसला नहीं कर लेती, तब तक यह खाता चालू रहता है। आप उसकी उच्च शिक्षा के फंड के लिए, उसके वयस्क (एडल्ट) होने पर, शेष राशि (अमाउंट) का 50% निकाल सकते हैं।

सुकन्या योजना कैलकुलेटर

जो व्यक्ति सुकन्या समृद्धि योजना SSY में इन्वेस्ट करने का विचार बना रहे हैं, वे सुकन्या योजना कैलकुलेटर का उपयोग करके देख सकतें हैं की मेच्यूरिटी के समय उन्हे कितना पैसा मिलेग। सुकन्या योजना कैलकुलेटर का उपयोग करने के लिए, उन्हें योजना की एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया (eligilility criteria ) को पूरा करना होगा। वर्तमान में, योजना द्वारा दी जाने वाली इंटरेस्ट रेट 7.6%, प्रति वर्ष है। योजना के अनुसार, नीचे दिए गए व्यक्ति SSY खाता खोल सकते हैं:

  • बेटी भारत की निवासी होनी चाहिए।
  • बेटी की उम्र 10 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
  • एक परिवार में दो से अधिक लड़कियों के लिए सुकन्या समृद्धि योजना खाता नहीं खोला जा सकता है।

व्यक्ति द्वारा दर्ज किए गए डिटेल्स के आधार पर, सुकन्या योजना कैलकुलेटर यह निर्धारित करता है कि व्यक्ति को मेचुरिटी पर कितना पैसा प्राप्त होगा। योजना के मेचुरिटी का समय 21 वर्ष है।

सुकन्या योजना कैलकुलेटर कैसे काम करता है? यह जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

इक्विटी म्यूचुअल फंड्स

जब आपका बच्चा छोटा है और आपका रिटायरमेंट कम से कम 15 से 20 साल दूर है, तब इक्विटी म्यूचुअल फंडस में इन्वेस्टमेंट शुरू करना सही है। यह आपको शेयर बाजार का गिरना और अस्थिरता जैसे झटके का आपके फण्ड पर असर को काम करता है। इक्विटी में इन्वेस्ट करने के लिए तकनीकी ज्ञान और अपडेट रहना आवश्यक है, जो हर किसी के लिए संभव नहीं है। इसलिए, बेहतर ऑप्शन इक्विटी म्यूचुअल फंड में इन्वेस्ट करना होता है। फंड्स मैनेजिंग कपंनियों के एक्सपर्ट्स कम से कम रिस्क वाले शेयरों को चुनना जानते हैं, और सुनिश्चित करते हैं कि आपका फंड लौंग टर्म में बढ़ें।

जब आपका बच्चा 4 या 5 साल का हो तो आप अपने बच्चे की शिक्षा के लिए विशेष रूप से एक इक्विटी म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो बना सकते हैं। यह माईनर्स के लिए खाता खोलकर और सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) द्वारा इक्विटी म्यूचुअल फंड में इन्वेस्ट कर के किया जा सकता है।

पब्लिक प्रोविडेंट फण्ड (पीपीएफ)- सार्वजनिक भविष्य निधि

सरकार द्वारा प्रोविडेंट फण्ड एकाउंट्स पर इंटरेस्ट रेट में कटौती के बाद भी, पीपीएफ अभी भी पेरेंट्स द्वारा पसंद किया जाता है। पीपीएफ में इन्वेस्टमेंट, अनुशासन को बढ़ावा देता है, क्योंकि आप 15 साल की मेचुरिटी पीरियड अंत होने पर ही कॉर्पस निकाल सकते हैं। यह आपको ईईई (एक्सेम्पट-एक्सेम्पट-एक्सेम्पट) टैक्स छूट का फ़ायदा देता है। चूंकि प्रिंसिपल अमाउंट, इंटरेस्ट और टोटल मेचुरिटी अमाउंट टैक्स फ्री हैं, इसलिए आप शिक्षा के इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य लिए फण्ड तैयार कर सकते हैं

डेट म्यूचुअल फंडस

यह एक अच्छा ऑप्शन है जहाँ आप अपने फंड को पार्क कर सकतें हैं, खासकर यदि आपका बच्चा पहले से ही कॉलेज जाने की तैयारी कर रहा है। सही रूप से, आप अपने सरप्लस पैसे को ऐसे पोर्टफोलियो, जिसमे डेट फंडोंस का ज्यादा एक्सपोज़र हो, में डाल सकते हैं। डेट म्यूचुअल फंडस फाइनेंसियल इंस्ट्रूमेंट हैं जो फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीस, जैसे ट्रेजरी बिल, सरकारी सिक्योरिटीस, और कॊरपोरेट बॉन्डस में इन्वेस्ट करते हैं।

मनी-बैक इन्शुरन्स प्लान्स

ये नॉन-लिंक्ड प्लान्स हैं जिन्हें आपके बच्चे के एजुकेशनल गोल्स को पूरा करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। पॉलिसी टर्म के दौरान कई पे आउट्स के माध्यम से डेथ बेनिफिट और लिक्विडिटी प्रदान करते हैं। आपके पास सर्वाइवल बेनिफिट (पॉलिसी राशि से अधिक) लेने का ऑप्शन पॉलिसी की टर्म के दौरान होता है। आमतौर पर पॉलिसी टर्म 15 वर्ष होती है, जबकि प्रीमियम पेमेंट टर्म 10 से 11 वर्ष इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य हो सकती है। आपके बच्चे के अलावा, आपको पॉलिसी की मचुरिटी पर बोनस भी प्राप्त होगा।

टैक्स बचाने के लिए ELSS और इंश्योरेंस में कौन बेहतर ?

better way to save income tax ELSS or Insurance

आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने पैसे से बेहतर मुनाफ़े की इच्छा रखता है , इसलिए उन संभावनाओं को तलाशता रहता है जहाँ उसका इन्वेस्टमेन्ट सुरक्षित भी रहे और किसी न किसी प्रकार से मुनाफा भी कमा कर दे । अब अगर मुनाफा होगा तो वह इनकम टैक्स को भी आकर्षित इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य करेगा। यहाँ हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि अगर हम अपना इनकम टैक्स बचाना चाहते हैं, तो निवेश के दो साधन ELSS और इंश्योरेंस में से कहाँ निवेश करना बेहतर होगा।

ELSS क्या है ?

  • ELSS का मतलब है इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम। इसको टैक्स बचाने वाला म्युचुअल फण्ड भी कहा जाता है।
  • इसमें डेढ़ लाख रुपये तक के निवेश पर इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80 C के तहत इनकम टैक्स में छूट मिलती है।
  • 80 C के तहत जितनी भी टैक्स बचाने वाली स्कीम हैं जैसे पीपीएफ , इंश्योरेंस की स्कीम आदि , उनमें ELSS ही है जिसमें इनकम टैक्स बेनिफिट के साथ सबसे ज्यादा रिटर्न मिलता है।
  • इसमें पैसा बाजार में लगाया जाता है। व्यक्ति अगर चाहे तो कितना भी पैसा इसमें लगा सकता हैं लेकिन इनकम टैक्स में छूट सिर्फ डेढ़ लाख रुपये तक ही मिलती है।

इंश्योरेंस क्या है ?

  • इंश्योरेंस रिस्क को कवर करता है। यहाँ इंश्योरेंस का मतलब है यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (ULIP)।
  • ULIP दो तरह से काम करता है। इसमें जो भी पैसा प्रीमियम के तौर पर दिया जाता है, उसका कुछ हिस्सा व्यक्ति को इंश्योरेंस का कवर देता है, और बाकी पैसा फंड्स में निवेश किया जाता है जैसे डेब्ट, इक्विटी या फिर दोनों में, जिसे फण्ड मैनेजर्स के द्वारा संचालित किया जाता है।
  • इसमें फंड्स को बदलने की सुविधा भी दी जाती है जिसे फंडस स्विचिंग या पोर्टफोलियो बदलना कहते हैं।
  • इसका रिटर्न बाकी इंश्योरेंस उत्पाद के मुकाबले बेहतर माना जाता है।
  • ULIP में प्रीमियम के तौर पर जो भी पैसा दिया जाता है उसे इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80 C के तहत इनकम टैक्स में छूट मिलती है।

इनकम टैक्स बचाने के लिये ELSS और ULIP में कौन बेहतर ?

यह जानने के दोनों की तुलना विभिन्न स्तर पर करना जरुरी है।

  • प्रोडक्ट की बनावट - ULIP जहाँ इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट दोनों है, वहीँ ELSS पूरी तरह से इन्वेस्टमेंट है। ELSS में पैसा लगाने का उद्देश्य निवेश पर अच्छा रिटर्न प्राप्त करना है। वैसे तो इंश्योरेंस के अंतर्गत कई उत्पाद बाजार में मौजूद हैं, लेकिन ULIP में निवेश तभी किया जाता है जब व्यक्ति इंश्योरेंस के साथ अच्छे रिटर्न की इच्छा रखता है।
  • लॉक -इन पीरियड - लॉक -इन पीरियड वह तय समय सीमा होती है जिसके भीतर निवेश का पैसा निकला नहीं जा सकता। एक ओर जहाँ ULIP का लॉक -इन पीरियड पाँच साल है, वहीँ ELSS का सिर्फ तीन साल। इसका मतलब यह है कि ELSS में पैसा ज्यादा जल्दी लिक्विडेट करने की सुविधा है जिसके कारण इसमें हर तीन साल में इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य फंड्स बदल कर रीइन्वेस्ट किया जा सकता है।
  • पैसा निवेशकरनेकीसुविधा - इंश्योरेंस में पैसे का निवेश प्रीमियम के तौर पर किया जाता है जिसे एक निश्चित अंतराल में लगातार इंश्योरेंस कंपनी को तब तक देते रहना है जब तक पॉलिसी जारी रहती है। यह साल में एक बार , दो बार , चार बार या हर महीने प्रीमियम भरने की सुविधा देता है। वहीँ अगर ELSS की बात की जाए तो इसमें एक छोटी रकम से भी इन्वेस्टमेंट की शुरुवात की जा सकती है और अपनी सुविधा के अनुसार पैसा कभी भी जमा कराया जा सकता हैं। अगर नियमबद्ध तरीके से इन्वेस्टमेंट करना चाहते हैं तो SIP का सहारा लिया जा सकता है। SIP का मतलब है सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान। इसमें इन्वेस्टर एक तय समय में एक निश्चित धनराशि अपने स्कीम में लगाता रहता है।
  • पैसे केनिवेशकामाध्यम - ULIP मैं पैसा डेब्ट , इक्विटी या दोनों में दोनों में लगाया जा सकता है , वहीँ ELSS में पैसा पूरी तरह से इक्विटी में लगाया जाता है , जिसकी वजह से रिटर्न अच्छे मिलते हैं। डेब्ट में पैसा लगाने से फिक्स्ड इनकम मिलता है , और निवेश का पैसा सुरक्षित रहता है , वहीँ इक्विटी में पैसा लगाना मतलब शेयर मार्किट में पैसे का निवेश। शेयर मार्किट में रिस्क तो है लेकिन उसी हिसाब से रिटर्न भी अच्छे मिलते हैं।
  • निवेशकेपैसोंपरलगनेवालेअतिरिक्तखर्चे – ULIP को मैनेज करने के लिए इन्शुरन्स कंपनी कई तरह के शुल्क लेती है जैसे - पॉलिसी जारी करने और यूनिट बाँटने का चार्ज , फण्ड को मैनेज करने का चार्ज , फंडस स्विचिंग चार्ज , पॉलिसी को मैनेज करने में की जाने वाली कागज़ी कार्यवाही का चार्ज , अगर बीमाधारक इंश्योरेंस कंपनी के अनुमानित आयु से कम जीवित रहता है तो उसे कॉम्पन्सेट करने का चार्ज , अगर पॉलिसी सरेंडर किया जाता है तो उसका चार्ज । इसकी वजह से निवेश किया गया पैसा थोड़ा कम हो जाता है। वहीँ अगर ELSS की बात करें इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य तो इसमें सिर्फ एक चार्ज लगता है जिसे फण्ड मैनेजमेंट फीस या एक्सपेंस रेश्यो कहते हैं।
  • पारदर्शिता - ELSS में निवेश किये गये पैसे पर 3 % फीस कटती है , और बाकि पैसा फंड्स में इन्वेस्ट किया जाता है। इस पारदर्शिता के चलते यह पता लगाया जा सकता है कि कितना पैसा निवेश किया गया है और उससे रिटर्न कितना मिला है। वही दूसरी और ULIP में कई तरह के चार्जेस हटाने के बाद पैसा निवेश किया जाता है। यह शुल्क शुरुवाती वर्षों में अधिक होता है जो बाद में कम होते जाते हैं। इन सब कारणों से इसमें पारदर्शिता नहीं रहती और वास्तव में कितना पैसा निवेश किया गया है , यह पता लगाना मुश्किल होता है।
  • लॉक इनपीरियडसेपहलेसरेंडरकरने के परिणाम

ELSS में तीन साल का लॉक इन पीरियड होता है जिसमें पैसा नहीं निकला जा सकता क्योंकि उन पैसों से म्यूच्यूअल फण्ड के यूनिट ख़रीदे जाते हैं जिनका लॉक इन पीरियड इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य तीन साल का होता है। इक्विटी में निवेश करने पर लम्बे समय के कैपिटल गेन पर टैक्स नहीं लगता। इसलिए इसमें किया गया निवेश और उससे मिलने वाले फायदे पर कोई टैक्स नहीं लगता है।

अगर ULIP में लॉक इन पीरियड के दौरान पॉलिसी को सरंडर किया जाता है तो सबसे पहले इंश्योरेंस कवर रोक दिया जाता है। जो भी टैक्स का फायदा इस बीच ULIP से मिल चुका है , वह रिवर्स हो जाता है और उस पर दोबारा टैक्स लगाया जाता है। पॉलिसी का जो भी सरंडर वैल्यू बनता है वह पाँच साल बाद मिलता है और वह भी कई सारे चार्जेज़ काटने के बाद। ULIP में मिलने वाला मैच्योरिटी बैनिफिट तभी टैक्स फ्री होता है अगर पॉलिसीहोल्डर की मृत्यु हो जाती है।

कुल मिलकर देखा जय तो ELSS और ULIP में यही समानता है कि दोनों टैक्स बचाते हैं और दोनों पैसों का निवेश करते हैं। हमें अपने लिए इंश्योरेंस चाहिए या इन्वेस्टमेंट यह हमारी इच्छा पर निर्भर करता है क्योंकि दोनों के संचालन और नियमों में फर्क है। एक सिर्फ पैसा बढ़ाता है तो दूसरा पैसे के साथ जीवन को इंश्योरेंस भी देता है। अगर इंश्योरेंस और रिटर्न दोनों अधिक मात्रा में चाहिए तो काफ़ी कम प्रीमियम में मिलने वाला टर्म इंश्योरेंस प्लान लेना चाहिए और साथ ही ELSS में पैसा निवेश करके अधिक रिटर्न का लाभ उठाना चाहिए। टर्म इंश्योरेंस भी बाकी इंश्योरेंस की तरह 80 C के तहत इनकम टैक्स में छूट देता है। अगर रिटर्न की बात की जाए तो ULIP हो चाहे ELSS, दोनों ही दस से पन्द्रह साल के अंतराल में बेहतर रिटर्न देना शुरू कर देते हैं । इसलिए लॉक इन पीरियड के बाद दोनों को ही नहीं छोड़ना चाहिए और समय दे कर पैसे को बढ़ने देना चाहिए।

टैक्स बचाने के लिए आखिरी समय में न करें ऐसी गलतियां, होगा बड़ा नुकसान, पढ़े किसमें निवेश बेहतर

वित्तीय वर्ष ख़त्म होने में कुछ ही महीने बचे हैं और आपके पास कंपनी से इन्वेस्टमेंट को लेकर रिमाइंडर भी आने लगे होंगे। अगर अभी तक आपने टैक्स बचने के लिए निवेश नहीं किया है तो अपनी टैक्स प्लानिंग शुरू.

टैक्स बचाने के लिए आखिरी समय में न करें ऐसी गलतियां, होगा बड़ा नुकसान, पढ़े किसमें निवेश बेहतर

वित्तीय वर्ष ख़त्म होने में कुछ ही महीने बचे हैं और आपके पास कंपनी से इन्वेस्टमेंट को लेकर रिमाइंडर भी आने लगे होंगे। अगर अभी तक आपने टैक्स बचने के लिए निवेश नहीं किया है तो अपनी टैक्स प्लानिंग शुरू करने के लिए अंतिम समय का इंतजार न करें। आखिरी समय निवेश के चक्कर में आपको निवेश के सही विकल्प के बारे में नहीं पता चलेगा और आप सही विकल्प के बजाय गलत विकल्प चुन सकते हैं, इससे आपको निवेश पर नुकसान भी झेलना पड़ सकता है। इसलिए अभी से टैक्स बचने के साथ अच्छे रिटर्न के लिए प्लानिंग शुरू कर लें।

ईएलएसएस में निवेश अच्छा विकल्प
इस बारे में मोतीलाल ओसवाल एएमसी के हेड ऑफ़ प्रॉडक्ट्स उमंग ठाकेर का कहना है आप खुद से पूछें, क्या निवेश के फैसले पल भर में किए जाने चाहिए या विचार-विमर्श के साथ किए जाने चाहिए? वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए टैक्स डेक्लेरेशन विंडो आम तौर पर जनवरी में समाप्त होती है, अगर अभी से प्लानिंग करेंगे तो आप अंतिम समय में गलती करने से बच सकते हैं। टैक्स बचाने के लिए ईएलएसएस श्रेणी के तहत लॉन्ग टर्म इक्विटी फंड में निवेश अच्छा विकल्प हो सकता है। निवेश से पहले अपने फाइनेंसियल एडवाइजर से जरूर सलाह लें और भली भांति जांच कर लें।

क्या हैं ईएलएसएस
ईएलएसएस या इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम, एक म्यूचुअल फंड स्कीम है जो आयकर अधिनियम 1961 की धारा 80C के तहत किसी व्यक्ति या एचयूएफ को कुल आय में से रु. 1.5 लाख तक की कटौती की अनुमति देती है। आपके दिमाग एक सवाल आ सकता है कि टैक्स सेविंग FD या PPF के बजाय ELSS को क्यों चुनना चाहिए। इसके पीछे कुछ बिंदु हो सकते हैं, इस पर ठाकेर का कहना है -
>टैक्स सेविंग FD और PPF निवेश के सुरक्षित रूप हैं और कम अस्थिर हैं, ELSS स्कीम आपकी पूंजी को मुद्रास्फीति से बचाने के लिए सबसे अच्छा दांव है।
>इंश्योरन्स पॉलिसियों के माध्यम से बचत - दोनों पारंपरिक या ULIP's (यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान्स) भी धारा 80C के तहत क्वालीफाई होते हैं, हालांकि इन पॉलिसियों के लिए मिनिमम लॉक-इन 5 वर्ष है।
>सभी टैक्स सेविंग विकल्पों में ELSS में 3 साल का सबसे कम लॉक-इन पीरियड है। इसके अलावा, उच्च अग्रिम शुल्क और मृत्यु दर मूल्य बीमा योजनाओं से रिटर्न्स को आकर्षक नहीं बनाते हैं।

ईएलएसएस में निवेश इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य कैसे करें
ईएलएसएस म्युचुअल फंड की पेशकश है, इसलिए आपके पास ELSS में 3 मार्गों के माध्यम से निवेश करने का विकल्प है - सिस्टमॅटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP), सिस्टमॅटिक ट्रांसफर प्लान (STP) और लम्पसम। ELSS योजनाओं में यूनिट्स के अलॉटमेंट की तारीख से तीन साल का लॉक-इन पीरियड होता है। लॉक-इन पीरियड समाप्त होने के बाद, यूनिट्स को रिडीम या स्विच किया जा सकता है। ELSS ग्रोथ और IDCW या आय वितरण सह पूंजी निकासी विकल्प (पहले लाभांश विकल्प के रूप में संदर्भित) दोनों ऑफर करता है। निवेशक सिस्टमॅटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के माध्यम से भी निवेश कर सकते हैं, और एक वित्तीय वर्ष में किए गए रु. 1.5 लाख तक के निवेश कर कटौती के लिए पात्र हैं।

ईएलएसएस कहा करता है निवेश
ELSS एक मल्टी-कैप फंड हैं, मतलब इसमें लार्जकैप, मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में निवेश किया जाता है। इसे फंड मैनेजर मैनेज करते हैं। ELSS फंड के बारे में दूसरा दिलचस्प पहलू यह है कि इक्विटी ओरिएंटेड निवेश होने के कारण वे 3 साल के लॉक-इन पीरियड के बाद भी जारी रह सकते हैं। ELSS में निवेश टैक्स बचाने के साथ आपको रिटर्न भी अच्छा दे सकता है। सालाना 1 लाख रुपये से अधिक के लाभ पर 10% LTCG टैक्स देना पड़ता है।

*डिस्क्लेमर- यह सूचना आपके लिए निवेश कि सलाह नहीं हैं, कोई भी निर्णय लेने से पहले स्कीम के बारे में पूरी जानकारी हासिल करें और अपने फाइनेंसियल एडवाइजर से सलाह लें।

मेक इन इंडिया के तहत नौकरी व रोज़गार के अवसर कितने होंगे?

मेक इन इंडिया भारत सरकार का एक मुख्य राष्ट्रीय प्रोग्राम है। डिपार्टमेंट ऑफ़ प्रमोशन ऑफ़ इंडस्ट्री और इंटरनल ट्रेड, मिनिस्ट्री ऑफ़ कॉमर्स एन्ड इंडस्ट्री द्वारा संचालित यह मेक इन इंडिया प्रोग्राम भारत की अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी लाएगा। भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इस समय जीडीपी में 16 प्रतिशत की भागीदारी कर रहा है। साल 2025 तक उम्मीद है कि यह सेक्टर 25 प्रतिशत तक डिलीवर करेगा। आने वाले 5 सालों में भारत को मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में विश्व के सर्वाधिक प्रतियोगी देशों में गिने जाने की संभावना है।

क्या है उद्देश्य ?

मेक इन इंडिया का प्राथमिक उद्देश्य भारत में वैश्विक इन्वेस्टमेंट को बढ़ाकर मेन्यूफेक्चरिंग सेक्टर मज़बूत करना है। मौजूदा भारतीय टैलेंट बेस का इस्तेमाल करना, सेकेंडरी एवं टर्शियरी सेक्टर को मज़बूत करना और अधिक रोज़गार के अवसर पैदा करना भी इसके उद्देश्यों में शामिल है।

"मेक इन इंडिया" और रोज़गार

मेक इन इंडिया प्रोग्राम ऑटोमोबाइल, बायोटेक्नोलॉजी , डिफेन्स , फ़ूड प्रोसेसिंग आदि जैसे 25 सेक्टरों पर फोकस करता है। हालाँकि इस प्रोग्राम के लॉन्च के बाद से नौकरी व रोज़गार के अवसर कितने पैदा हो पाए यह पता कर पाना थोड़ा अस्पष्ट रहा है। साल 2022 तक मेक इन इंडिया प्रोग्राम से भारत सरकार 100 मिलियन नयी नौकरियों के अवसर तैयार कर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोज़गार के असीमित अवसर लाना चाहती है। सरकार के मेक इन इंडिया प्रोग्राम से मैन्युफैक्चरिंग पर दिए जा रहे ज़ोर के कारण आने वाले सालों में कई नयी नौकरियां निकलने की संभावना है।सरकार साल 2022 तक 100 मिलियन जॉब्स देने का लक्ष्य लेकर चल रही है।

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क्या है उम्मीदें ?

उम्मीद है कि अगले एक-आध साल में लगभग 8 लाख अस्थायी नौकरियां तैयार हो सकती हैं। जैसे जैसे मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग और सम्बंधित सेक्टर में इन्वेस्टमेंट बढ़ेगा, वैसे वैसे मौजूदा नौकरियों में भी बढ़ोतरी की संभावनाएं हैं। मेक इन इंडिया की पहल से ई-कॉमर्स और अन्य इंटरनेट से जुड़े सेक्टर में भी नौकरियां बढ़ी हैं। मेक इन इंडिया प्रोग्राम से स्किल डेवलपमेंट ने भी काफी ज़ोर पकड़ा है। 100 स्मार्ट सिटी बनाने के लक्ष्य से भी जॉब्स बढ़ने के आसार हैं।

"मेक इन इंडिया" पर क्यों हैं चर्चा ?

दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों के लिए भारत सरकार का प्रगतिशील "मेक इन इंडिया " प्रोग्राम चर्चा का विषय बन गया है। इसके तहत देश को एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की तैयारी की जा रही है। भारतीय मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में कुछ बुनियादी बदलाव करके मेक इन इंडिया प्रोग्राम इस सेक्टर को और मज़बूत करने का लक्ष्य रखता है। हालाँकि जैसे जैसे यह लक्ष्य तेज़ी पकड़ेगा, वैसे वैसे जॉब मार्किट में भी कई बदलाव आने की संभावना है।

भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेज़ी लाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए रोज़गार और उत्पादन दोनों में बढ़त आना ज़रूरी है। विशेषज्ञ अच्छी और बुरी दोनों संभावनाओं से इंकार नहीं कर रहे हैं। हालाँकि उम्मीद की किरण 'मेक इन इंडिया' द्वारा जॉब्स क्रिएट किये जाने की तरफ ज़्यादा है।

मेक इन इंडिया कैंपेन से कैसे बढेंगी जॉब्स ?

इंडस्ट्री के लोगों में सरकार के इस कदम से काफी सकारात्मकता आई है। केंद्रीय सरकार मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत कई सेक्टरों में इन्वेस्ट कर रही है। जब इन्वेस्टमेंट बढ़ता है तो ग्रोथ भी बढ़ती है। ग्रोथ के कारण इन सेक्टर्स में जॉब की इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य संख्या भी बढ़ेंगी। काफी लम्बे समय तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोज़गार के अवसरों के बढ़ते रहने के आसार लगाए जा रहे हैं।

बदलेगा "लेबर लॉ"

कैंपेन के तहत लेबर लॉ में होने वाले बदलावों के कारण अब मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कॉन्ट्रैक्ट लेबर रखने के लिए लगने वाले फ़िज़ूल के आबंध हट जाएंगे। इन रिफॉर्म्स के कारण अब यह सेक्टर और खुलेगा। लेबर लॉ रिफॉर्म्स के ज़रिये रोज़गार के अवसरों में भी तेज़ी आएगी। लेबर रेगुलेशन एक्ट के सेक्शन 10 जैसे कुछ लेबर कानून हैं जो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कॉन्ट्रैक्ट लेबर रखने पर बेवजह ही आबंध लगाते हैं। रिफॉर्म्स के बाद यह सब हट जाएगा। संभावनाएं है कि ऐसे क़दमों से यह सेक्टर पहले की तुलना में और भी तेज़ी से बढ़ेगा। जब लेबर काम पर रखने के लिए स्वतंत्रता होगी तो निश्चित रूप से अधिक जॉब्स के अवसर भी पैदा होंगे। घरेलू कंपनियां वैश्विक ब्रांड्स में तब्दील हो सकती हैं।

ईज़ ऑफ़ डूईंग बिज़नेस इंडेक्स

सरकार ने “ईज़ ऑफ़ डूईंग बिज़नेस इंडेक्स” पर भी ध्यान देना शुरू किया है। भारत फिलहाल 190 देशों में ईज़ ऑफ़ डूईंग बिज़नेस के पैमाने पर 63वें स्थान पर काबिज़ है। मौजूदा कानून और पेचीदा प्रक्रियाओं के कारण भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ काफी धीमी रही है। इस मेक इन इंडिया कैंपेन के तहत जो नयी पॉलिसीस लागू की जा रही हैं , उनसे भूमि अधिग्रहण और निकासी सम्बन्धी प्रक्रियाएं पहले से अधिक आसान और तेज़ होंगी।

स्पेशल इकनोमिक ज़ोन्स

देश के अलग अलग हिस्सों में स्पेशल इकनोमिक ज़ोन्स और ऐसी इकाइयां बनाए जाने की तैयारी है जो बिज़नेस यूनिट्स की दिक्कतों को 72 घंटों के भीतर सॉल्व करेंगी। ऐसा करने से भारत दुनिया के लिए एक अनुकूल मैन्युफैक्चरिंग ठिकाना बन सकता है। भविष्य में इस अच्छी इमेज से भारत में इन्वेस्टमेंट के कई द्वार खुलेंगे। जब इन्वेस्टमेंट आती है तो मानव संसाधन की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। अतः यह इन्वेस्टमेंट अपने साथ इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य में रोज़गार के कई अवसर भी लेकर आएगी।

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अन्य सेक्टर्स पर प्रभाव

मेक इन इंडिया के तहत जो इन्वेस्टमेंट मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में होगा, उससे न सिर्फ उत्पादन बल्कि अन्य सेक्टर्स में भी तेज़ी आएगी। मूलभूत सुविधाओं और ऊर्जा के क्षेत्र में नयी कंपनियां स्थापित होने के बाद सर्विस सेक्टर में भी निश्चित ही नए रोज़गार बढ़ने की संभावना है।

आगे की राह

इस कैंपेन से यकीनन भारत की तरक्की को एक नयी और बेहतर दिशा मिली है। खासकर इन्वेस्टमेंट प्लान्स के उद्देश्य कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को इस दिशा की काफी आवश्यकता थी। अब सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि इन सब पॉलिसीस को कितना बेहतर ढंग से लागू किया जाता है। इन प्लान्स और स्कीमों का असर, आने वाले कुछ सालों में और भी साफ़ देखा जा सकेगा। विशेषज्ञों की मानें तो रोज़गार व नौकरियों के अवसरों में अच्छा उछाल आने की बहुत प्रबल संभावनाएं हैं , बशर्ते इन पॉलिसीस का, प्लान के हिसाब से ही क्रियान्वयन हो पाए।

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