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बैंक पूंजी

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बैंक या पोस्ट ऑफिस नहीं यहां मिल रहा FD पर हाई रिटर्न! कंपनी की ग्रोथ की तरह बढ़ेगा आप का पैसा

नई दिल्ली: पैसे की सेविंग करना आज के समय की जरुरत बन गया है,जिससे अपने लिए लोग मोटी कमाई को जमा कर पाए। मौजूदा समय बैंक या डाकघर की फिक्स्ड डिपॉजिट योजनाएं पॉपुलर हैं। फिक्स्ड डिपॉजिट एक सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट की तरह काम करता है, जिसमें एक तय अवधि में तय ब्याज के हिसाब से रिटर्न मिलता है। लाखों लोगों का निवेश करने में एफडी पर भरोसा रहता है। बैंक या डाकघर की एफडी में जहां पैसा सेफ रहता है, वहीं तय दर से ब्याज भी मिलता है। तो वही आज आप को बैंक पूंजी यहां पर एक जगह और FD पर मोटी कमाई करने के बारे में बता रहे हैं।

आप तो बता दें कि ऐसे कई जानकार बताते हैं कि Corporate FD में भी लगाना अच्छा रहता है। जिससे यहां पर बैंकों की तुलना में 2 से 3 फीसदी ज्यादा ब्याज मिल रहा है। क्योंकि समय-समय पर बैंको में ब्याद कर में कोटौती होती रहती है।

कई लोगों को पता नहीं होता है बैंक पूंजी कि बैंक, पोस्टऑफिस के अलावा कई कंपनियां भी एफडी कर सकती है। इसे Corporate Fixed Deposit कहा जाता है। यहां पर निवेश में लोगों की पूंजी भी सुरक्षित रहती है। और मोटी कमाई की जा सकती है।

Corporate Fixed Deposit एक टर्म डिपॉजिट है जिसे निश्चित अवधि के लिए ब्याज की निश्चित दरों पर रखा जाता है। वित्तीय और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के जरिए Corporate Fixed Deposit पेश की जाती है।

बता दें कि Corporate Fixed Deposit कंपनियों द्वारा जारी की जाती है। यहां आमतौर मेच्योरिटी की अवधि 6 माह से 5 साल या इससे भी ज्यादा होती है। यहां पर एफडी में ब्याज दर बैंक एफडी की तुलना में ज्यादा होती है। वही बैंक की तुलना में जोखिम कुछ अधिक होता है। अगर कंपनी डिफाल्ट कर गई तो पैसा फंसने का डर होता है।

Corporate Fixed Deposit करने से पहले इन बातों का रखे ध्यान

वहीं किसी भी Corporate Fixed Deposit को चुनने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे

अतीत में लिए फैसलों की काली छाया से भयभीत बीजेपी, पीएम मोदी तक अपनी राजनीतिक पूंजी का जिक्र करने से कर रहे परहेज

केंद्र में अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में बीजेपी और पीएम मोदी ने जो राजनीतिक पूंजी कमाई थी, वह सब खर्च हो चुकी है। हालत यह है कि अतीत में लिए फैसलों का जिक्र तक करने से बीजेपी परहेज कर रही है। उसे इन फैसलों की काली छाया डरा रही है।

Getty Images

आकार पटेल

बीजेपी सरकार 2019 के चुनावों में जबरदस्त ऊर्जा और गतिमान शक्ति के साथ उतरी थी। मई 2019 में उसे मिली जीत न सिर्फ निर्णायक थी बल्कि 2014 के मुकाबले प्रधानमंत्री को अधिक सीटें हासिल हुईं। इसी जनादेश के दम पर और इस विचार के साथ कि बदलाव के लिए लोग उनके साथ हैं, प्रधानमंत्री ने इतने वर्षों में कमाई अपनी राजनीतिक पूंजी खर्च करना शुरु कर दी। करीब एक साल तक यानी जून 2020 तक यह पूंजी खर्च होती रही और इसके बाद यह हवा हो गई।

इन 12 महीनों के दौरान काफी कुछ हुआ और इसके परिणाम और प्रभाव आज भी देश पर हावी हैं। आइए देखते हैं कि कैसे क्या-क्या हुआ।

25 जुलाई को लोकसभा में तीन तलाक बिल पास हुआ। वैसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही तीन तलाक को अवैध घोषित कर चुका था, लेकिन इस बिल के जरिए इसे अपराध बना दिया गया। इसके साथ ही कई बीजेपी शासित राज्यों ने फ्रीडम ऑफ रिलीजन (धार्मिक स्वतंत्रता) कानून बनाकर हिंदू और मुसलमानों के बीच अंतरधार्मिक विवाह पर पाबंदी लगा दी। इसे एक तरह से कथित लव जिहाद के खिलाफ कदम बताया गया।

कुछ दिनों बाद 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया गया। बीजेपी के लिए यह एक अहम लम्हा था। 31 अगस्त को राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनपीआर) को असम में प्रकाशित किया गया और इसके साथ ही उन लोगों को जेल में डालने की प्रक्रिया शुरु कर दी गई जो लोग यह साबित नहीं कर पाए कि उनके पुरखे 1971 से पहले ही असम में रह रहे थे।

कुछ सप्ताह बाद ही 9 नवंबर को बीजेपी के लिए एक और उत्साही क्षण आया। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन मंदिर को सौंप दी और बीजेपी के तीन दशक पुराने आंदोलन का पटाक्षेप कर दिया।

अगले महीने ही 9 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लोकसभा से पास कर दिया गया। पाठकों को याद होगा कि किस तरह केंद्रीय गृहमंत्री ने इसकी क्रोनोलॉजी समझाते हुए कहा था कि पहले सीएए आएगा और उसके बाद देशव्यापी एनआरसी लागू होगा।

इसके बाद बीजेपी की कथित उपलब्धियों का चरम उस समय हुआ जब कुथ सप्ताह बाद ही तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अहमदाबाद में नरेंद्र मोदी स्टेडियम के उद्घाटन में पहुंचे। और शायद इसके साथ ही बीजेपी के तरकश के सारे तीर खत्म हो चुके थे।

सीएए के खिलाफ देश भर में आंदोलन हुए और विश्व स्तर पर इसके खिलाफ जबरदस्त आक्रोश देखा गया। अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान ही दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़के और साफ हो गया कि बीजेपी का व्यवस्था पर दिल्ली तक में पूर्ण नियंत्रण नहीं है।

इसके अगले महीने ही देश भर में कोविड के नाम पर लॉकडाउन लगा दिया गया। इसके बारे में आम धारणा यह रही कि यह दुनिया का सबसे सख्त लॉकडाउन था। लेकिन लॉकडाउन के बावजूद कोविड संक्रमण की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई। कुछ ही ही सप्ताह बाद लद्दाख में चीन के साथ भीषण लड़ाई हुई जिसमें हमारे 20 सैनिकों की शहादत हुई। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भारत के नजरिए में बड़ा बदलाव आया और फोकस परंपरागत रूप से पश्चिम और पाकिस्तान से हटकर पूर्व की तरफ हो गया। हमें आज तक नहीं पता है, यहां तक कि विदेश मंत्री भी नहीं समझा पाए कि आखिर चीन ने ऐसा किया क्यों था।

उसी साल 5 जून को, यानी सरकार की सत्ता में वापसी के एक साल बाद एक बड़ा कदम उठाते हुए कृषि कानूनों का अध्यादेश ले आया गया। इसके खिलाफ किसानों के आंदोलन ने सरकार की गतिशीलता को विराम दे दिया।

कश्मीर में यूं तो अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया गया लेकिन बीजेपी को नहीं पता था कि इसके बाद क्या करना है। और उसे अभी भी शायद ही समझ आ रहा है कि क्या किया जाए। दक्षिण एशिया में शायद कश्मीर ही ऐसी जगह है जहां कोई चुनी हुई सरकार नहीं है। अनुच्छेद 370 हटने के तीन साल और विधानसभा भंग किए जाने के 4 साल बाद भी अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित उस रवैये के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं जो उनके साथ किया जा रहा है।

अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाले कानून भी पचड़े में पड़े हुए क्योंकि उन्हें बनाने और लागू करने से पहले शायद दिमाग लगाया ही नहीं गया। इसी महीने कानूनी खबरों की जानकारी देने वाली एक वेबसाइट की हेडलाइन थी, “मध्‍य प्रदेश धर्म स्‍वतंत्रता अधिनियम: हाईकोर्ट ने अंतर-धार्मिक जोड़ों को कलेक्टर के सामने धर्मांतरण की घोषणा करने के प्रावधान को 'प्रथम दृष्टया असंवैधानिक' पाया”। गुजरात हाईकोर्ट ने भी इस कानून के खिलाफ ऐसा ही आदेश सुनाया।

इसी तरह विवादित कृषि कानूनों को भी प्रधानमंत्री ने माफी मांगते हुए तब वापस लेने की घोषणा की जब देश भर में इन कानूनों के खिलाफ किसान लामबंद होकर सड़को पर उतर आए। सीएए को भी तीन साल हो गए हैं, लेकिन सरकार किसी न किसी कारण से इसे लागू करने से बचती रही है। देशव्यापी एनआरसी की तो अब कोई चर्चा तक नहीं होती।

आखिर में, अर्थव्यवस्था की बात करें तो, इस अवधि के दौरान इस बारे में कुछ अच्छी बात करने को है ही नहीं। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि नौ तिमाहियों से देश की जीडीपी धीमी हो गई है, यानी जनवरी 2018 के शुरु होकर अगले करीब सवा दो साल तक। कोविड महामारी ने अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंची और अर्थव्यवस्था को पहले से हो रहे नुकसान पर पड़े पर्दे को नोंच कर फेंक दिया। प्रति व्यक्ति जीडीपी में बांग्लादेश हमसे आगे निकल गया तो इसका कारण सिर्फ कोविड महामारी के दौरान कुप्रबंधन नहीं था। बल्कि हमारा पड़ोसी तो 2015 से ही हमसे होड़ लेकर काफी मेहनत बैंक पूंजी से आगे बढ़ रहा था, और संकेत मिलने लगे थे कि अगर हमने होश नहीं संभाला तो जिस वक्र रेखा पर वह आगे बढ़ रहा है वह हमें पीछे छोड़ ही देगा। और ऐसा ही हुआ। सरकारी आंकड़ों से मिला बेरोजगारी का आंकड़ा बताता है कि देश में इस दौरान बिना काम के लोगों की संख्या 4 साल के सर्वाधिक स्तर पर थी।

2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के घोषणा प्तर में कहा गया था कि सरकार के सुशासन का बड़ा संकेतक यह है कि वह विश्व बैंक की डूइंग बिजनेस (पहले इसे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस कहा जाता था) की रैंकिंग में भारत की स्थिति सुधरी है। लेकिन जब सामने आया कि कुछ देश अपनी स्थिति को बेहतर दर्शाने के लिए प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं तो दुर्भाग्य से 2020 में इस रैंकिंग को बंद कर दिया गया।

उस एक साल की कथित तीव्रगामी रफ्तार के अलावा शासन के स्तर पर दिखाने के लिए कुछ और है नहीं। कोविड की दूसरी लहर ने उस विश्वसनीयता को भी बट्टा लगा दिया जो इसने इस साल कमाई थी, और शायद यही कारण था कि प्रचार और पब्लिसिटी के बिना सांस तक न लेने वाले प्रधानमंत्री पूरे 20 दिन तक लोगों के सामने ही नहीं आ पाए।

यही वे सारे कारण हैं कि राजनीतिक प्रचार अभियानों में सरकार के शासन और प्रदर्शन की चर्चा के बजाए सिर्फ करिश्मे पर भरोसा कर रही है बीजेपी। अतीत में जो कुछ हुआ वह बहुत पुराना तो नहीं है, लेकिन उसका जिक्र भी नहीं किया जा रहा। यहां तक कि नोटबंदी तक पर अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई शुरु कर दी है, हालांकि बीजेपी चाहती है कि इसे भुला ही दिया जाए।

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सूरत : चुनाव के बाद यार्न में तेजी के आसार,डिजिटल लेनदेन अच्छा

कपड़ा मार्केट में ग्राहकी नही होने से यार्न की भी मांग नहीं बढ़ी

उधना विस्तार में रोड नंबर 9 स्थित अमर कृपा नेरोफैब के नाम से यार्न का व्यवसाय करने वाले केशुभाई पिपलिया (पटेल) बताते हैं कि यार्न का व्यवसाय हाल के दिनों में बहुत ही धीमी गति से चल रही है। व्यापार में सुधार नहीं होने से व्यापारियों के लेनदेन में दिक्कतें आती है। दीपावली में पर व्यापार उठने की उम्मीद थी, लेकिन ऑल ओवर बैंक पूंजी कपड़ा मार्केट में ग्राहकी नही होने से यार्न की भी मांग नहीं बढ़ी।

व्यापार में तरह-तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं

पिछले 28 सालों से यार्न के व्यवसाय से जुड़े केशुभाई पिपलिया ने बताया कि कोरोना से पहले यार्न व्यवसाय बहुत अच्छा था। कोरोना में सब बंद होने के बाद यार्न व्यवसाय भी बंद ही था, लेकिन इसके बाद यार्न व्यापार में वह उछाल नहीं आया जो पहले था। हालांकि हाल में धीरे-धीरे व्यापार चल रहा है। वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए व्यापार में तरह-तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं। जिससे उधार में माल मिलना न के बराबर हो गया है। यही कारण है कि आज जिसके पास जितनी पूंजी है वह उतना ही सरलता से व्यापार कर रहा है।

बैंक जाना बहुत कम हो गया

केशुभाई बताते हैं कि हाल में चल रहे चुनाव के बाद नई सरकार के गठन हो जाने पर यार्न व्यवसाय मे तेजी की उम्मीद जताई जा रही है। यानी व्यापार उठने के बैंक पूंजी आसार रहेंगे।

व्यापार में डिजिटल लेनदेन के बारे में बताते हुए कहा कि डिजिटल लेनदेन हाल के दिनों में बहुत अच्छा है। जहां छोटे-बडे काम को लेकर बैंकों में आना-जाना पड़ता था, जिसमें ईंधन और समय भी बर्वाद होता था। आज आरटीजीएस एवं अन्य डिजिटल बैंकिंग के माध्यम से व्यापारियों के पेमेंट कर दिए जाते हैं और मुझे भी व्यापारी कर देता है। ऐसे में बैंक जाना बहुत कम हो गया।

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