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निवेश और अर्थव्यवस्था

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निवेश में कमी तथा जीएसटी संग्रह भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी चुनौतियां: गोल्डमैन

भारत की औसत आर्थिक वृद्धि दर 2010 से 2014 के बीच 6.7 प्रतिशत रही, जो 2015 से 2019 के दौरान बढ़कर 7.3 प्रतिशत पर पहुंच गई. इस दौरान औसत मुद्रास्फीति 10 प्रतिशत की तुलना में कम होकर 5 प्रतिशत पर आ गई.

नई दिल्ली: आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति के मोर्चों पर सकारात्मक उपलब्धियों के बावजूद भारत के समक्ष कमजोर निवेश और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) का कम संग्रह समेत कुछ बड़ी चुनौतियां हैं. वैश्विक वित्तीय सेवा प्रदाता गोल्डमैन सॉक्स ने एक रिपोर्ट में यह बात कही है.

भारत की औसत आर्थिक वृद्धि दर 2010 से 2014 के बीच 6.7 प्रतिशत रही, जो 2015 से 2019 के दौरान बढ़कर 7.3 प्रतिशत पर पहुंच गई. इस दौरान औसत मुद्रास्फीति 10 प्रतिशत की तुलना में कम होकर 5 प्रतिशत पर आ गई.

गोल्डमैन सॉक्स की मुख्य अर्थशास्त्री (भारत) प्राची मिश्रा ने एक पॉडकास्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था के कारकों के बारे में चर्चा की.

उन्होंने चर्चा के दौरान कहा, 'आर्थिक वृद्धि दर मजबूत रहने के बाद भी निवेश का माहौल काफी नरम रहा है.' उन्होंने कहा, 'मैं कहना चाहूंगी कि कमजोर निवेश, नीतिगत फैसलों का निवेश और अर्थव्यवस्था लाभ लक्ष्य तक पहुंचने में सुस्ती और जीएसटी का कम संग्रह ऐसे समय में अभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौतियों में से हैं.'

मिश्रा ने कहा कि इस दशक में भारत की औसत आर्थिक वृद्धि दर करीब 7 प्रतिशत रही है. इसमें तीन-चौथाई योगदान उपभोग का रहा है तथा निवेश ने इसमें महज एक-चौथाई का योगदान दिया है.

उन्होंने कहा, 'गोल्डमैन सॉक्स के उपभोक्ता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या सरकार के पास खासकर भूमि, श्रम, निर्यात संवर्धन और निजीकरण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार करने की इच्छा है.'

मदन सबनवीस का कॉलम: अर्थव्यवस्था बेशक निवेश और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, लेकिन वृद्धि के लिए निवेश और उपभोग का बढ़ना भी जरूरी

मदन सबनवीस, चीफ इकोनॉमिस्ट, केयर रेटिंग्स - Dainik Bhaskar

इस साल के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान -8% है, जो चौथी तिमाही में नकारात्मक वृद्धि की ओर इशारा करता है। यह चिंताजनक है क्योंकि अर्थव्यवस्था के बढ़ने और तीसरी तिमाही में वृद्धि 0.4% रहने के बाद उम्मीद थी कि चौथी तिमाही में तेजी आएगी। चिंता के 2 कारण हैं। पहला, विभिन्न राज्य संक्रमण के नए मामलों के चलते लॉकडाउन की घोषणा कर रहे हैं, जिनका चौथी तिमाही की धीमी वृद्धि की गणना में ध्यान रखा गया।

दूसरा, इस नकारात्मक वृद्धि का बड़ा कारण ‘कुल कर’ घटक में तेज गिरावट है, क्योंकि ग्राॅस वैल्यू ऐडेड (GVA) के 2.5% बढ़ने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि टैक्स कलेक्शन पर दबाव बना रहेगा। वित्तीय वर्ष 2020-21 में उपभोग और निवेश दोनों में गिरावट रही है, जो वृद्धि के 2 साधन हैं। गिरावट क्रमश: 6% और 10.6% है। इसे बदलना होगा। तीसरी तिमाही में निवेश और उपभोग में सकारात्मक वृद्धि दिखी, हालांकि उपभोग 1% ही बढ़ा।

निवेश में बढ़ोतरी हुई क्योंकि केंद्र सरकार ने बजट के अनुसार पूंजीगत व्यय बनाए रखा। ज्यादातर उद्योगों में अतिरिक्त क्षमता और इंफ्रास्ट्रक्चर पर सीमित गति से खर्च के कारण निजी निवेश निवेश और अर्थव्यवस्था नहीं बढ़ा। NPA पर चिंतिंत बैंकों की निवेश के लिए कर्ज देने की अनिच्छा भी एक कारण है। बड़ी चिंता उपभोग है, क्योंकि इस तिमाही में 1% की वृद्धि दबी मांग की अवधारणा पर सवाल उठाती है।

ऐसी उम्मीद थी कि सितंबर तक अर्थव्यवस्था काफी खुल चुकी थी और त्योहारी मौसम के कारण शहरी व ग्रामीण परिवारों में मांग बढ़ेगी। कृषि उत्पादन के दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक, ज्यादातर फसलों की उपज इस साल सर्वोच्च स्तर पर पहुंचेगी। इस तरह, खरीफ फसल के कारण किसानों द्वारा ज्यादा व्यय होना चाहिए, हालांकि ऐसा इस साल हुआ नहीं।

उधर परिवार के मामले में शुरुआत में व्यय में बढ़ोतरी हुई, लेकिन यह बरकरार नहीं रही। आखिरी तिमाही में भी इसके बढ़ने की खासी उम्मीद नहीं है। इसी संदर्भ में 1 फरवरी को आए बजट को देखना चाहिए। क्या इसने उपभोग बढ़ाने के लिए कुछ किया? जवाब है कुछ खास नहीं क्योंकि व्यय के लिए टैक्स इंसेंटिव नहीं दिए गए, इसीलिए भविष्य में व्यय की बढ़ोतरी 2 कारकों पर निर्भर होगी।

पहला, ज्यादा नौकरियां पैदा करना, ताकि लोगों के पास खर्च करने को पैसा हो। दूसरा, भारतीय कंपनियों की आय पहले जितनी होना क्योंकि कई कंपनियों ने लॉकडाउन के दौरान वेतन कटौती की, जिसे वापस नहीं लिया गया। जहां आईटी, फार्मा, एफएमसीजी जैसे उद्योगों ने पुराने वेतन की बहाली पर काम किया, लेकिन ऐसा सभी उद्योगों में नहीं हुआ। वृद्धि के लिए अगले वित्त वर्ष में ऐसा होना जरूरी है।

वित्त वर्ष 2021-22 निश्चित तौर पर वृद्धि के मामले में बेहतर होगा, लेकिन ऐसा नकारात्मक बेस इफेक्ट के कारण ज्यादा होगा। जीडीपी वृद्धि वित्तीय वर्ष 2020-21 में 8% गिर गई है और इसमें होने वाली कोई भी वृद्धि आकंड़ों के हिसाब के अच्छी लगेगी। लेकिन जरूरी नहीं कि इससे नौकरियां पैदा हों। उदाहरण के लिए वित्तीय वर्ष 2019-20 में यह 145.7 लाख करोड़ रु. थी, जो वित्तीय वर्ष 2020-21 में गिरकर 134.1 लाख करोड़ हो जाएगी।

अब अगर वित्तीय वर्ष 2021-22 में वृद्धि 10% रहती है, तो यह 147.5 लाख करोड़ रु. पर पहुंचेगी, जो वित्तीय वर्ष 2019-20 पर 1.2% की वृद्धि है। इस तरह वित्तीय वर्ष 2021-22 आंकड़ों में तो बेहतर वर्ष होगा, लेकिन जरूरी नहीं कि तेज वृद्धि के लिए जरूरी उच्च उपभोग व निवेश भी हो। इस सबके बीच बैंकिंग व्यवस्था स्थिर बनी रहेगी।

बैंक अब भी इसे लेकर अनिश्चित हैं कि इस साल उनका पोर्टफोलियो कैसा रहेगा। आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट कहती है कि अत्यधिक तनाव वाली परिस्थिति में एनपीए 13-14% तक बढ़ सकते हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 की शुरुआत में यह चीज सही होना चाहिए क्योंकि जब अर्थव्यव्सथा धीरे-धीरे इस नकारात्मक वृद्धि के सिंड्रोम से बाहर निकलेगी, तब वित्त की जरूरत होगी और बैंकों को उद्योग तथा सेवाओं के लिए कर्ज देने को ज्यादा तैयार रहना होगा।

इसीलिए, जीडीपी के आंकड़े उम्मीद जगाने वाले हैं लेकिन इन्हें सावधानी से समझना चाहिए क्योंकि बेशक अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, लेकिन उपभोग और निवेश जैसे अन्य तत्वों के माध्यम से संतुलन बनाए रखना होगा, साथ ही बैंकिंग क्षेत्र को जरूरी मदद देनी होगी।

''महामारी के दौरान फ्रांसीसी कंपनियों का निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्वास को दर्शाता है''

नई दिल्लीः फ्रांस के विदेशी कारोबार मंत्री फ्रैंक रिस्टर ने कहा कि कोविड-19 महामारी के वैश्विक प्रभाव के बावजूद फ्रांसीसी कंपनियों ने भारत में काफी निवेश किया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके विश्वास को दर्शाता है। रिस्टर ने भारत फ्रांस वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (आईएफसीसीआई) द्वारा आयोजित भारत फ्रांस-कारोबारी सम्मान (आईएफबीए) के चौथे संस्करण में पुरस्कार प्रदान करने के बाद यह बात कही ।

आईएफसीसीआई के बयान के अनुसार, इस कार्यक्रम में भारत स्थित फ्रांस की एयरोस्पेस, रक्षा, ऊर्जा, उपभोक्ता उत्पाद आदि क्षेत्रों से जुड़ी कंपनियों के कारोबारियों ने हिस्सा लिया। इसमें 12 श्रेणियों में पुरस्कारों की घोषणा की गई थी और दोनों देशों से 100 आवेदन प्राप्त हुए थे। कार्यक्रम में फ्रांस के विदेशी कारोबार मंत्री रिस्टर ने कहा कि कोविड-19 महामारी के वैश्विक प्रभाव के बावजूद फ्रांसीसी कंपनियों ने भारत में काफी निवेश किया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके विश्वास को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि पिछले कई वर्षो में भारत और फ्रांस के बीच महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग काफी बढ़ा है और हमारे सामरिक गठजोड़ में रक्षा, सुरक्षा, असैन्य नागरिक सहयोग, कारोबार एवं निवेश क्षेत्र महत्वपूर्ण स्तम्भ है। उन्होंने कहा कि वैश्विक महामारी के दौरान भारत ने दृढ़ता का परिचय दिया है।

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प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ निर्यात पर ध्यान देने का समय

एफडीआइ को प्रोत्साहित करने के लिए अर्थव्यवस्था के मूलभूत तत्वों को मजबूत करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि जब अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, तो रुपया भी प्राय: मजबूत होता है। निर्यात और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि ही गिरते रुपए को मजबूत बना सकते हैं।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साथ निर्यात पर ध्यान देने का समय

अमरीकी डॉलर के मुकाबले रुपए में रेकॉर्ड गिरावट आई है। रुपया डॉलर के मुकाबले 77 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर अपने निचले स्तर पर पहुंच गया है। यह गिरावट एक ऐसे दौर में आई है, जब अमरीकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने का सिलसिला थमा नहीं है और भारत में महंगाई सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। रुपए में रेकॉर्ड गिरावट के साथ ही देश का विदेशी मुद्रा भंडार 600 बिलियन डॉलर से नीचे चला गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया, लेकिन उसकी मंशा गिरावट को थामना था, न कि उसके रुख को बदलना। रिजर्व बैंक ने भारतीय रुपए की मजबूती के लिए डॉलर की काफी बिकवाली की है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार 3 सितम्बर 2021 के सर्वकालिक उच्च स्तर 642 अरब डॉलर से 45 अरब डॉलर कम हो गया। मौजूदा अनिश्चितता को देखते हुए आरबीआइ विदेशी मुद्रा भंडार को 600 अरब डॉलर पर बनाए रखना चाहती है। हालांकि विदेशी मुद्रा भंडार अब भी 12 महीने के आयात के लिए काफी है, लेकिन इसमें तेजी से कमी आ सकती है।
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमरीका में महंगाई 40 साल के उच्चतम स्तर पर है। इस महंगाई से निपटने के लिए अमरीकी फेडरल रिजर्व ने करीब चार वर्ष बाद ब्याज दरों में वृद्धि की घोषणा की है और इस साल इस तरह की छह और बढ़ोतरी के स्पष्ट संकेत दिए हैं। वर्ष के अंत तक फेडरल ब्याज दरें 1.75 फीसदी से 2 फीसदी के बीच होंगी, जबकि 2023 के अंत तक फेडरल ब्याज दरें 2.8 प्रतिशत तक पहुंच सकती हैं। इससे पूर्व अमरीका में ब्याज दर लगभग शून्य पर थी। अमरीकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि से दुनिया भर के निवेशक अब अमरीका की ओर जा रहे हैं। वैश्विक निवेशक दुनिया भर की संपत्तियों में निवेश करने के लिए शून्य या कम ब्याज दरों वाले देशों से उधार लेते हैं। इसे ही 'कैरी ट्रेडÓ कहते हैं। अमरीका में ब्याज दर इस बढ़ोतरी से पूर्व लगभग शून्य थी। ऐसे में निवेशक वहां से लोन लेकर भारत सहित अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करते थे, जहां ब्याज दर ज्यादा है। कोरोना काल में भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी के पीछे यही 'कैरी ट्रेडÓ था, परन्तु अब 'कैरी ट्रेडÓ उलट रहा है। यही कारण है कि विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार बिकवाली कर अपना निवेश निकाल रहे हैं। चालू वित्त वर्ष 2022-23 में अप्रेल से लेकर अब तक भारतीय बाजार से 5.8 अरब डॉलर का विदेशी निवेश निकाला जा चुका है। ऐसे में रुपए पर दबाव स्वाभाविक है।
भारतीय नीति निर्माता समुचित प्रबंधन द्वारा रुपए की गिरावट को रोक सकते हैं। वर्ष 2008 से 2011 के दौरान भी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य संकटपूर्ण रहा था, लेकिन भारतीय रुपया लगातार मजबूत हो रहा था। रुपए की कमजोरी से डीजल-पेट्रोल महंगे हो सकते हैं। खाद्य तेल के भी महंगा होने की आशंका है, परन्तु रुपए की कमजोरी से निर्यातकों को लाभ हो सकता है। उच्च निर्यात द्वारा भारत न केवल व्यापार संतुलन, डॉलर स्टॉक इत्यादि में वृद्धि का लाभ ले सकता है, अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकता है। इसके लिए युद्ध स्तर की तैयारी की आवश्यकता है।
इसके बावजूद यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था मूलत: आयात आधारित अर्थव्यवस्था है। ऐसे में सरकार को रुपए को मजबूत करने के लिए हर संभव कदम उठाने होंगे। इसका सबसे अच्छा तरीका है, भारतीय उद्योगों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अर्थात एफडीआइ को प्रोत्साहित किया जाए। एफडीआइ को प्रोत्साहित करने के लिए अर्थव्यवस्था निवेश और अर्थव्यवस्था के मूलभूत तत्वों को मजबूत करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि जब अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, तो रुपया भी प्राय: मजबूत होता है। निर्यात और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि ही गिरते रुपए को मजबूत बना सकते हैं।

शिक्षा में निवेश वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2.54 ट्रिलियन डॉलर जोड़ सकता है: WEF

जिनेवा, 17 मई, 2022 (डब्ल्यूएएम) -- वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा कि आज के शीर्ष 10 स्कोरिंग देशों के औसत स्तर तक समस्या-समाधान के लिए छात्रों की क्षमता में दुनिया भर में सुधार वैश्विक अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त 2.54 ट्रिलियन डॉलर जोड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि महामारी के प्रभाव, पहले से मौजूद असमानताएं और चौथी औद्योगिक क्रांति (4IR) के तेजी से तकनीकी परिवर्तन का मतलब है कि यथास्थिति में लौटने से न केवल वैश्विक आर्थिक सुधार को कम करने का जोखिम है, बल्कि इससे जुड़ी एक पूरी पीढ़ी की क्षमता को भी रोकना है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के विजन फॉर फ्यूचर-प्रूफ एजुकेशन 4.0 के अनुसार, "बच्चों को बढ़ने में सक्षम बनाने के लिए हमें उन शिक्षण प्रणालियों को बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो बच्चों, परिवारों, समुदायों और समाजों को आज व कल के लिए आवश्यक कौशल विकसित करें।"

रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों को आज जलवायु परिवर्तन, स्वचालन और तेजी से डिजिटलीकरण की महामारी के बाद की एक तेजी से अनिश्चित दुनिया में अपना रास्ता खोजने की जरूरत है। फोरम की नई रिपोर्ट इकोनॉमिक केस फॉर एजुकेशन 4.0 से पता चलता है कि यह न केवल बच्चों के लिए अच्छा है, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छा है। "खेल सबसे स्वाभाविक तरीका है, जिससे बच्चे न केवल पढ़ने और लिखना सीखते हैं, बल्कि शारीरिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक, रचनात्मक और भावनात्मक रूप से विकसित होते हैं। फिर भी यह शिक्षा प्रणालियों में व्यापक रूप से परिलक्षित नहीं होता है। रिपोर्ट के अनुसार, "सीखने और खेलने के बीच इस संबंध को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए सिस्टम बदलने के लिए पेरेंट्स, शिक्षकों और नीति निर्माताओं के सहयोग के साथ मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता होगी।"

रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि इन कौशलों को अनलॉक करने के लिए कार्यबल में निवेश करने और शिक्षकों को नए तरीके से पढ़ाने के लिए नई शिक्षण विधियों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है। "इस तरह के तरीके प्रेरणा, जुड़ाव, आवाज और एजेंसी का निर्माण करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि बच्चे सीखने के लिए अपनी जिज्ञासा और उत्साह बनाए रखें। "और जो बच्चे सीखना पसंद करते हैं वे संभावित रूप से ऐसे वयस्कों के रूप में विकसित होते हैं, जो गतिशील अर्थव्यवस्थाओं की बदलती कार्यबल आवश्यकताओं के अनुकूल होने के लिए बेहतर ढंग से सुसज्जित होते हैं।"

वैश्विक महामारी के बाद की रिकवरी के रूप में मौजूदा समय में सीखने को बदलने और शिक्षा को फिर से परिभाषित करने के लिए रणनीतिक निवेश के अवसरों की पहचान करने के लिए एक अनूठी खिड़की है। इसके लिए शिक्षण कार्यबल के अपस्किलिंग और नई शैक्षणिक विकास के साथ नए मूल्यांकन तंत्र और नई शिक्षण तकनीकों को अपनाने में निवेश की आवश्यकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आज और भविष्य में शिक्षण क्या हो सकता है और कैसा दिखना चाहिए, इसकी पुनर्कल्पना करने के लिए सिस्टम समावेशी होना चाहिए, आवश्यक कौशल पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और शिक्षार्थियों को पहले स्थान पर रखने के लिए तकनीकी और शैक्षणिक नवाचार का लाभ उठाना चाहिए। रिपोर्ट के अंत में बताया गया, "शिक्षा 4.0 को एक सार्वभौमिक वास्तविकता बनाने के लिए बढ़ते मूवमेंट का सहयोग करने में सरकारों व गैर-सरकारी एजेंसियों से लेकर व्यवसायों, निवेशकों व शिक्षकों, पेरेंट्स और देखभाल करने वालों के साथ शिक्षार्थियों के सभी हितधारकों की भूमिका है।"

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