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हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं

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नयी दिल्ली, 15 नवंबर (भाषा) विशेषज्ञों ने मंगलवार को कहा कि भारत के 2023 में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश के रूप में चीन से आगे निकलने को दुनिया के लिए संसाधन निर्माता बनने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। साथ ही न्याय सुनिश्चित करने व बुजुर्ग आबादी की देखभाल पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

दुनिया की आबादी ने मंगलवार को आठ अरब के आंकड़े को छू लिया। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया की जनसंख्या सात अरब से आठ अरब तक पहुंचने में 17.7 करोड़ लोगों का सर्वाधिक योगदान भारत हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं का है जबकि दूसरे नंबर पर चीन है जिसने इसमें 7.3 करोड़ लोग जोड़े।

अनुमान है कि भारत अगले साल तक चीन को पछाड़कर दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा।

‘पॉपुलेशन हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ (पीएफआई) ने कहा कि इस मील के पत्थर को एक समस्या के रूप में नहीं बल्कि भारत के लिए बेहतर योजना बनाने और दुनिया भर के लोगों के लिए एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन प्रदान करने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।

पीएफआई ने कहा, ‘‘कुछ वर्ग यह आशंका व्यक्त करते रहे हैं कि अधिक जनसंख्या शासन के लिए एक समस्या होगी। हालांकि, इसे एक अवसर की तरह देखना चाहिए।’’

पीएफआई की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा ने कहा, ‘‘हम जानते हैं कि दुनिया भर में जनसंख्या वृद्धि स्थिर हो रही है। विश्व की जनसंख्या को सात से आठ अरब तक पहुंचने में 12 साल लग गए, वहीं 2037 तक नौ अरब तक पहुंचने में लगभग 15 साल लगेंगे जोकि यह दर्शाता है कि जनसंख्या वृद्धि की गति धीमी हो रही है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अब हमें गर्भनिरोधक की अधूरी आवश्यकता को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि महिलाएं यह तय कर सकें कि उन्हें बच्चे पैदा करने हैं या नहीं और यदि हां, तो कब, कितने और किस अंतराल पर।’’

मुतरेजा ने कहा कि जनसंख्या और सीमित संसाधनों के बीच के अनावश्यक द्वंद्व पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘कुशल आबादी एक ताकत है और हमें आबादी को संसाधनों के हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं निर्माता के रूप में देखना चाहिए।’’

‘सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च’ की कार्यकारी निदेशक अखिला शिवदास ने दुनिया की जनसंख्या आठ अरब होने को लेकर कहा कि इससे बहुत अधिक घबराने की जरूरत नहीं है लेकिन जनसंख्या बढ़ने के कारण होने वाली दिक्कतों जैसे आजीविका संकट और हाशिये पर पड़ी महिलाओं और कमजोर तबकों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

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Ideas For India

शहरीकरण, लैंगिक और सामाजिक परिवर्तन: महिलाओं की राजनीतिक वरीयताओं को आकार देने में मीडिया की भूमिका

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University of Oxford

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Centre for Policy Research

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Johns Hopkins University

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Centre for Policy Research

राजनीतिक वरीयताओं को तय करने में सूचना स्रोतों की क्या भूमिका होती है, और किन परिस्थितियों में महिलाएं अपनी राजनीतिक राय बनाने के लिए पुरुषों से अलग संज्ञानात्मक सोच रखती हैं? इसका पता लगाने हेतु, उत्तर भारत के दो शहरी समूहों के किये गए सर्वेक्षण डेटा का उपयोग करते हुए, यह लेख दर्शाता है कि रोजगार या अन्य गतिविधियों के माध्यम से घर के बाहर के महिलाओं के नेटवर्क का परिवार में पक्षपातपूर्ण असहमति की संभावना पर एक प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

यह लेख 'शहरीकरण, लैंगिक और सामाजिक परिवर्तन' पर आधारित पांच-भाग की श्रृंखला में अंतिम है।

आधुनिक लोकतंत्रों में, अपनी राजनीतिक राय बनाने और निर्वाचित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित कराने के लिए राजनीति के बारे में विश्वसनीय जानकारी रखना आवश्यक है (ड्रुकमैन 2004)। इस प्रकार, पक्षपातपूर्ण वरीयताओं को समझने में मीडिया और जनता के व्यवहार के बीच का संबंध स्वाभाविक रुचि का है। भारत में लोगों की राजनीतिक वरीयताएँ बनाने में सोशल मीडिया और सूचना स्रोतों की क्या भूमिका है? और किन परिस्थितियों में महिलाएं अपनी राजनीतिक राय बनाने के लिए पुरुषों से अलग संज्ञानात्मक सोच रखती हैं?

एक नए अध्ययन (बद्रीनाथन एवं अन्य 2021) में, हम परिवार में महिलाओं की पुरुषों से स्वतंत्र राजनीतिक वरीयताओं को व्यक्त करने के अवसर पैदा करने में मीडिया और गैर मीडिया व्यक्तिगत नेटवर्क की भूमिका को समझना चाहते हैं। ऐसा करने के लिए, हम एक ही परिवार में महिलाओं और पुरुषों के बीच राजनीतिक-पार्टी की वरीयताओं में असहमति से संबंधित राजनीतिक स्वतंत्रता के एक प्रमुख संकेतक पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हम इस व्यवहार को 'अंतर-पारिवारिक पक्षपातपूर्ण असहमति' कहते हैं।

राजनीतिक वरीयताओं में सूचना स्रोतों की भूमिका को समझने में भारत एक महत्वपूर्ण परीक्षण मामला है। भारत में इंटरनेट तक पहुँच और मीडिया के नए रूपों में तेजी से और अभूतपूर्व प्रगति के साथ ही मीडिया परिदृश्य में पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर बदलाव देखे गए हैं। हालांकि, पैमाना, पहुंच और प्रभाव में यह वृद्धि भारत में मीडिया के उपभोग के सटीक तरीकों पर ध्यान देने संबंधी समान वृद्धि से मेल नहीं खाती है और परिवारों के भीतर इससे जुडी असमानताएं और परिणामी राजनीतिक प्रभाव नजर आते हैं।

सूचना और राजनीतिक वरीयताओं का सिद्धांत

महिलाओं की राजनीतिक स्वतंत्रता पर विभिन्न सूचना स्रोत किस प्रकार से असर डालते हैं यह स्पष्ट करने के लिए हम एक सरल सैद्धांतिक फ्रेमवर्क तैयार करते हैं। हम सूचना पहुंच के दो रूपों के बीच अंतर करते हैं- टेलीविजन जैसे मास मीडिया का 'वन-वे' या निष्क्रिय स्रोत, जिसमें सूचना प्राप्त करने वाला समाचार स्रोत के साथ चर्चा या बातचीत नहीं कर सकता है; तथा सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट और एप्लिकेशन के 'टू-वे' या सूचना के सक्रिय स्रोत, जिसमें सूचना प्राप्त करने वाला सूचना-प्रदाता के साथ सक्रिय रूप से चर्चा या बहस कर सकता है। यहाँ तक कि ​​लोगों के सोशल मीडिया पर अलग-अलग निजी नेटवर्क हैं (एक ही समाचार कार्यक्रम देखने के विपरीत) और वे निजी तौर पर अपने नेटवर्क से जुड़ सकते हैं, सोशल मीडिया में एक ही परिवार के भीतर अलग-अलग पक्षपातपूर्ण वरीयताएं उत्पन्न करने की क्षमता है। मास मीडिया के स्रोत को व्यक्ति द्वारा अलग-अलग नहीं किया जाता है, क्योंकि इसके अधिकांश उपभोग को परिवार के सदस्यों द्वारा सार्वजनिक रूप से साझा किया जाता है।

हमारा तर्क है कि परिवार के सभी सदस्यों की सोशल मीडिया तक पहुंच में वृद्धि से पूरी आबादी में, विशेष रूप से एक ही परिवार के महिलाओं और पुरुषों के बीच सूचना तक पहुंच में असमानताओं को कम करने की क्षमता है। तथापि, अगर महिलाओं की सोशल मीडिया तक व्यक्तिगत पहुंच कम है, तो वे निजी जानकारी के लिए भौतिक (मीडियेतर) नेटवर्क पर निर्भर होंगी। यदि ऐसा है, तो जिन महिलाओं की रोजगार या घर के बाहर अन्य प्रकार की गतिशीलता के माध्यम से घर के बाहर नेटवर्क तक अधिक पहुंच है, उनकी पुरुषों के साथ पक्षपातपूर्ण असहमति प्रदर्शित करने की संभावना अधिक है। इसके अलावा, हम मानते हैं कि इस तरह की असहमति राष्ट्रीय राजनीति की तुलना में राज्य की राजनीति में प्रदर्शित होने की अधिक संभावना है, क्योंकि महिलाओं के लिए भौतिक नेटवर्क राज्य की राजनीति के संदर्भ में सबसे अधिक जानकारीपूर्ण होने की संभावना है।

इन तर्कों की जाँच के लिए, हम उत्तर भारत के दो शहरी समूहों- पटना (बिहार) हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं और धनबाद (झारखंड) में रहनेवाले 1,600 से अधिक परिवारों का एक अनूठा सर्वेक्षण करते हैं। हम प्रत्येक परिवार के भीतर, एक पुरुष प्राथमिक वेतन-भोगी और एक बेतरतीब ढंग से चुनी गई कामकाजी उम्र की महिला का साक्षात्कार करते हैं, और मीडिया तक पहुंच में लैंगिक असमानता और पक्षपातपूर्ण असहमति के संबंध को दर्शाने के लिए हम मीडिया उपभोग पर एक व्यापक मॉड्यूल का इस्तेमाल करते हैं।

सूचना पहुंच में लैंगिक अंतर

सबसे पहले, हम विभिन्न प्रकार के मीडिया में समाचार-सूचना प्राप्त करने वाले महिलाओं और पुरुषों के प्रतिशत में प्रमुख लैंगिक असमानताएँ पाते हैं। पटना और धनबाद दोनों में, लगभग तीन-चौथाई महिला हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं उत्तरदाताओं ने दुनिया के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए किसी समाचार स्रोत से परामर्श करने की बात नहीं कही, इससे पता चलता है कि वे इसके लिए अपने परिवार या निजी जानकारी पर महत्वपूर्ण रूप से निर्भर थे। इससे स्पष्ट होता है कि महिलाओं के संदर्भ में प्रभाव के मीडियेतर स्रोत विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दूसरा, आम तौर पर टेलीविजन और मास मीडिया, समाचारों के लिए अब तक सबसे अधिक उपभोग वाले मीडिया स्रोत हैं। हालांकि, मास मीडिया के संदर्भ में, ध्यान देने योग्य लैंगिक अंतर है। जबकि, विशेष रूप से कक्षा 10 तक शिक्षा पूरी करने वाले पुरुष प्राथमिक वेतन-भोगी बताते हैं कि उन्होंने मीडिया के विविध स्रोतों का उपयोग किया। कामकाजी उम्र की महिलाएं यदि एक ही समाचार स्रोत के उपयोग के बारे में बताती है तो वे लगभग विशेष रूप से टेलीविजन से जुड़ी होती हैं। इसके अलावा, नियमित रूप से सोशल मीडिया तक पहुंचने के लिए आवश्यक मोबाइल फोन (विशेषकर स्मार्टफोन) का व्यक्तिगत उपयोग जनता में महिलाओं के बीच कम रहता है। उदाहरण के लिए, धनबाद के वयस्कों में, 82 फीसदी पुरुषों की तुलना में केवल 35% महिलाओं के पास मोबाइल फोन (स्मार्टफोन) हैं।

तीसरा, आबादी का केवल एक छोटा सा हिस्सा दो प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म- फेसबुक और व्हाट्सएप का उपयोग समाचार के स्रोत के रूप में करता है। यहां भी, एक महत्वपूर्ण लैंगिक अंतर है- समाचार के स्रोत के रूप में फेसबुक या व्हाट्सएप का उपयोग करनेवाली हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं 10 वीं कक्षा पूरी कर चुकी महिलाओं की हिस्सेदारी समान शैक्षिक योग्यता वाले पुरुषों की तुलना में 7 से 10 प्रतिशत कम है।

पक्षपातपूर्ण असहमति

पक्षपातपूर्ण असहमति को मापने के लिए, हमने उत्तरदाताओं से हमें यह बताने के लिए कहा कि केंद्र में और अपने-अपने राज्यों में "वे किस पार्टी का समर्थन करते हैं"। हमने असहमति के एक रूढ़िवादी उपाय का विकल्प चुना, यह कोडिंग कि क्या किसी व्यक्ति ने भाजपा और जद(यू) को छोड़कर किसी भी प्रमुख विपक्षी दल (भले ही ये विपक्षी दल गठबंधन में हों या नहीं) का समर्थन करने की तुलना में भाजपा (भारतीय जनता पार्टी; केंद्र में सत्तारूढ़ दल) या जद (यू) (जनता दल (यूनाइटेड); बिहार में सत्तारूढ़ दल, भाजपा के साथ गठबंधन में) का समर्थन किया।

भारत में दहेज पर विश्व बैंक की ये रिपोर्ट आँख खोलने वाली है

90% से अधिक जोड़े शादी के बाद पति के परिवार के साथ रहते हैं.

90% से अधिक जोड़े शादी के बाद पति के परिवार के साथ रहते हैं.

विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया है कि पिछले कुछ दशकों में, भारत के गाँवों में दहेज प्रथा काफ़ी हद तक स्थिर रही है. लेकिन ये प्रथा बदस्तूर जारी है.

शोधकर्ताओं ने 1960 से लेकर 2008 तक ग्रामीण भारत में हुई 40,000 शादियों का अध्ययन किया है.

उन्होंने पाया है कि 95% शादियों में दहेज दिया गया, जबकि 1961 से भारत में इसे ग़ैर-क़ानूनी घोषित किया जा चुका है.

दहेज के कारण कई बार महिलओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है, उनके साथ घरेलू हिंसा होती है और कई बार तो मौत भी हो जाती है.

दक्षिण एशिया में दहेज लेना और देना शताब्दियों पुरानी प्रथा है, जिसमें दुल्हन के परिजन पैसा, कपड़े, गहने आदि दूल्हे के परिजनों को देते हैं.

यह शोध भारत के 17 राज्यों पर आधारित है, जहाँ पर भारत की 96% आबादी रहती है. इसमें ग्रामीण भारत पर ही ध्यान केंद्रित किया गया है, जहाँ भारत की बहुसंख्यक आबादी रहती है.

अर्थशास्त्री एस अनुकृति, निशीथ प्रकाश और सुंगोह क्वोन ने पैसे और सामान जैसे तोहफ़ों की क़ीमत की जानकारियाँ जुटाई हैं, जो शादी के दौरान दी या ली गईं.

1975 से 2000 के बीच दहेज स्थिर रहा

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

उन्होंने 'कुल दहेज' का आकलन किया है. इसके लिए उन्होंने दुल्हन के परिवार की ओर से दूल्हे या उसके परिवार को दिए गए तोहफ़ों की रक़म और दूल्हे के परिवार से दुल्हन के परिवार को दी गई रक़म के बीच अंतर निकाला है.

उन्होंने पाया कि 1975 से पहले और 2000 के बाद मुद्रा स्फ़ीति के कारण कुल दहेज का औसत 'उल्लेखनीय रूप से स्थिर' था.

शोधकर्ताओं ने पाया है कि दूल्हे के परिवार ने दूल्हन के परिवार के लिए उपहारों में औसतन 5,000 रुपए ख़र्च किए.

दुल्हन के परिवार की ओर से आश्चर्यजनक रूप से दूल्हे के परिवार को दी गई तोहफ़ों की रक़म सात गुना थी, यानी यह तक़रीबन 32,000 रुपए की रक़म थी. इसका अर्थ हुआ है कि औसतन वास्तविक दहेज 27,000 रुपए के क़रीब था.

दहेज में परिवार की बचत और आय का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च होता है: 2007 में ग्रामीण भारत में कुल दहेज वार्षिक घरेलू आय का 14% था.

वर्ल्ड बैंक रिसर्च ग्रुप की अर्थशास्त्री डॉक्टर अनुकृति कहती हैं, "आय के हिस्से के रूप में, ग्रामीण भारत में औसत आय बढ़ने के साथ दहेज कम हुआ है."

वो कहती हैं, "लेकिन यह केवल एक औसत दावा है जबकि दहेज कितना बड़ा है, इसकी गणना हर परिवार की अलग-अलग आय से ही पता चल सकती है. हमें घरेलू आय या व्यय पर आँकड़े की आवश्यकता होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पास ऐसा कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं है."

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    कोरोना संक्रमण का ग्राफ समतल लेकिन मामलों में लगातार वृद्धि चिंता का विषय: एम्स निदेशक

    एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया. (फोटो: एएनआई)

    नई दिल्ली: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने मंगलवार हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं को कहा कि कोविड-19 का ग्राफ अब तक अपेक्षाकृत फ्लैट (समतल) बना हुआ है लेकिन लगातार समान रफ्तार से मामलों में वृद्धि चिंता का विषय है.

    गुलेरिया ने कहा कि विभिन्न मॉडलिंग विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोरोना वायरस के मामलों की संख्या में चरमोत्कर्ष अगले चार से छह सप्ताह यानी मई के आखिर या जून के मध्य तक हो सकता है, ऐसे में हमें और चौकस रहने तथा हॉटस्पॉट में मामलों की संख्या घटाने की कोशिश करने की जरूरत है.

    उन्होंने यह भी कहा, ‘देश में सर्दियों में एक बार फिर कोविड-19 के मामले बढ़ सकते हैं लेकिन यह तो वक्त ही बताएगा.’

    इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, स्पैनिश फ्लू के साथ भारत के अनुभव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस दौरान 70 लाख में से अधिकतर मौतें दूसरे दौर में हुई थीं. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह समय आराम करने का नहीं है.

    उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिए वर्गीकरण रणनीति बेहद छोटे स्तर पर होनी चाहिए, जिसमें पूरे जिले को रेड जोन घोषित करने बजाय स्थानीय हॉटस्पॉट क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाए.

    उनकी ये टिप्पणियां ऐसे वक्त आयी हैं जब कई राज्य सरकारें गृह मंत्रालय के दिशानिर्देश के अनुसार पाबंदियों में ढील दे रही हैं तथा शराब की दुकानें खुलने दे रही है.

    गुलेरिया ने कहा, ‘यह ग्राफ लॉकडाउन और अन्य निषिद्ध उपायों से अबतक अपेक्षाकृत रूप से फ्लैट (समतल) रहा है और इसने हमें देश में अपना स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा खड़ा करने और परीक्षण सुविधाएं बढ़ाने का समय दे दिया है.’

    उन्होंने कहा, ‘लेकिन मामलों की संख्या स्थिर दर से लगातार बढ़ रही है और यह चिंता हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं का विषय है. हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और लॉकडाउन के सिद्धांतों और एक दूसरे से दूरी बनाकर रखने के नियम का ईमानदारी से पालन करना चाहिए खासकर यदि वे हॉटस्पॉट या निषिद्ध में हैं तो.’

    उन्होंने उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने पर जोर दिया जहां कोविड-19 के मामले अधिक हैं ताकि वहां से इस वायरस का संक्रमण नहीं फैले.

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के हम किस मुद्रा जोड़े पर ध्यान केंद्रित करते हैं आंकड़े के अनुसार मंगलवार सुबह को पिछले 24 घंटे में देश में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या बढ़कर 1,568 हो गयी और इसके रोगियों की संख्या 42,836 हो गयी.

    (समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)


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