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एशियाई सत्र

एशियाई सत्र

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आंतरिक एशियाई अध्ययन के लिए केंद्र, अंतराष्ट्रीय अध्ययन का स्कूल जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय जो कि पूरे मध्यम एशिया की शिक्षा और शोध के साथ जुड़ा हुआ है। जिसमे पांच मध्यम एशियाई उजबेकिस्तान का लोकतंत्र, तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, क्य्रजिकस्तान और कजाकस्तान; तिब्बत और चीन के शिनजिन क्षेत्र; मंगोलिया और अफगानिस्थान जो शुरुआत से मध्यम एशियाई अध्ययन प्रोग्राम, दक्षिण के लिए केंद्र , माध्यम, दक्षिणी एशियाई अध्ययन और दक्षिणी पश्चिमी प्रशांत अध्ययन द्वारा किया जाता है। समय के साथ ये प्रोग्राम भारत में मध्यम एशियाई अध्ययन के लिए आधुनिक केंद्र के रूप में उभरा और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने निपुण खोज कार्य और प्रकाशन के लिए जाना गया ।इस शिक्षाविद प्रोग्राम ने भारत के लोगों और अधिकारियों का मध्यम एशियाई के सिर्फ मुख्य निर्माण में मदद की है बल्कि इसने भारत की संस्कृति को माध्यम एशियाई के पडोसी तक बढ़ाने में भी अपना योगदान दिया है ।इसे योगदान को ध्यान में रखते हुए , संस्था ने विश्वविद्यालय को २००१ में इस प्रोग्राम को क्षेत्र अध्ययन प्रोग्राम के लिए स्वीकृति प्रदान की । बाहरी कार्यों के मंत्रालय,भारत सरकार ने २००७ में एक योजना शुरू की जिसके अनुसार मध्यम एशियाई लोकतंत्र से इस प्रोग्राम में प्रत्येक सत्र(जो छ: महीने का होता है) में नियमित आधार पर तीन विद्वानों को बुलाया जायेगा।

विश्वविद्यालय के पास इन मध्यम एशियाई लोकतंत्र के विद्वानों की मेजबानी के लिए रहने का प्रबंधन भी प्रदान किया जाता है,नियमित आधार परसभी शिक्षाविद प्रक्रिया जिसमे शिक्षा और शोध शामिल है को इतिहास,राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, उर्जा की जियोराजनीति और यातायात तंत्र के अध्ययन और संशोधन के लिए बनाया गया है न कि मध्यम एशियाई के विकास के लिए। चीन के मध्यम एशिया, अफगानिस्तान और मंगोलिया और इन्हें भारत के अनुभव और योजना के साथ मिलाना। १९८७ से १२० से ज्यादा एम्फिल एशियाई सत्र और ८५ पिएचडी शोध विद्वान मध्यम एशियाई अध्ययन से जुड़े हुए हैं । जहाँ १०० एम फिल और ५३ पिएच डी विद्वान अपनी डिग्री प्राप्त कर चुके हैं, २० एम् फिल और ३२ पि एच डी अभी प्रगतिशील हैं।सही मायने में विद्यार्थियों और विद्वानों की दिए गए शोथ कार्य में रूचि बढ़ रही है।ऐसे आन्तरिक एशियाई अध्ययन अपने केंद्र के लिए खुद को शिक्षाविद निपुणता ऊपर बताये गए क्षेत्र में विकास करने की कोशिश कर रहा है।

A warm welcome to the modified and updated website of the Centre for East Asian Studies. The East Asian region has been at the forefront of several path-breaking changes since 1970s beginning with the redefining the development architecture with its State-led development model besides emerging as a major region in the global politics and a key hub of the sophisticated technologies. The Centre is one of the thirteen Centres of the School of International Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi that provides a holistic understanding of the region.

Initially, established as a Centre for Chinese and Japanese Studies, it subsequently grew to include Korean Studies as well. At present there are eight faculty members in the Centre. Several distinguished faculty who have now retired include the late Prof. Gargi Dutt, Prof. P.A.N. Murthy, Prof. G.P. Deshpande, Dr. Nranarayan Das, Prof. R.R. Krishnan and Prof. K.V. Kesavan. Besides, Dr. Madhu Bhalla served at the Centre in Chinese Studies Programme during 1994-2006. In addition, Ms. Kamlesh Jain and Dr. M. M. Kunju served the Centre as the Documentation Officers in Chinese and Japanese Studies respectively.

The academic curriculum covers both modern and contemporary facets of East Asia as each scholar specializes in an area of his/her interest in the region. The integrated course involves two semesters of classes at the M. Phil programme and a dissertation for the M. Phil and a thesis for Ph. D programme respectively. The central objective is to impart an interdisciplinary knowledge and understanding of history, foreign policy, government and politics, society and culture and political economy of the respective areas. Students can explore new and emerging themes such as East Asian regionalism, the evolving East Asian Community, the rise of China, resurgence of Japan and the prospects for reunification of the Korean peninsula. Additionally, the Centre lays great एशियाई सत्र emphasis on the building of language skills. The background of scholars includes mostly from the social science disciplines; History, Political Science, Economics, Sociology, International Relations and language.

Several students of the centre have been recipients of prestigious research fellowships awarded by Japan Foundation, Mombusho (Ministry of Education, Government of Japan), Saburo Okita Memorial Fellowship, Nippon Foundation, Korea Foundation, Nehru Memorial Fellowship, and Fellowship from the Chinese and Taiwanese Governments. Besides, students from Japan receive fellowship from the Indian Council of Cultural Relations.

कोविड-19: एशियाई देशों से अभिव्यक्ति की आज़ादी को नहीं दबाने का आग्रह

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बेशेलेट 24 जून 2019 को जिनीवा में मानवाधिकार परिषद के 41वें सत्र को संबोधित करते हुए

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने कहा है कि एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के दर्जन से भी ज़्यादा देशों ने कोविड-19 महामारी का मुक़ाबला करने के प्रयासों के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी दबाया है जो बहुत चिन्ताजनक है.

UN Human Rights Chief alarmed by clampdown on freedom of expression in Asia-Pacific during #COVID19 & tightening of censorship in several countries. @mbachelet says any actions taken to stop the spread of false information must be proportionate.Read: https://t.co/5ODnnfe0Fe pic.twitter.com/5nuEvry0ZN

उन्होंने बुधवार को देशों की सरकारों से अपील करते हुए कहा कि झूठी जानकारी या सूचनाएँ फैलने से रोकने के लिए जो भी क़दम उठाए जाएँ, वो क़ानून, आवश्यकता और आनुपातिक सिद्धान्तों के दायरे में हों, यानि उनके ज़रिये ज़्यादती ना हो जाए.

“भारी अनिश्चितता के इस दौर में नागरिकों को अपनी चिन्ताएँ ज़ाहिर करने का अधिकार है.”

राय सुनी जाए

मिशेल बाशेलेट ने कहा, “चिकित्सा से जुड़े पेशेवर लोगों, पत्रकारों, मानवाधिकारों के पैरोकारों और आम जनता, सभी को सार्वजनिक हित से जुड़े अत्यन्त महत्वपूर्ण मुद्दों पर राय अभिव्यक्त करने की इजाज़त होनी चाहिए."

"इनमें स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक संकट का मुक़ाबला करने के लिए किए जा रहे प्रबन्ध, और राहत सामग्री का वितरण जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.”

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने भारत, बांग्लादेश से लेकर म्याँमार और वियतनाम से लेकर फ़िलीपीन्स जैसे अनेक देशों के उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह लोगों पर अपने देशों की सरकारों की कार्रवाई की आलोचना करने या कोविड-19 के बारे में कथित रूप से ग़लत जानकारी फैलाने के आरोपों में या तो जुर्माना लगाया गया है, या कुछ को गिरफ़्तार भी किया गया है.

बांग्लादेश में पिछले तीन महीनों के दौरान अनेक लोगों पर आरोप निर्धारित किए गये हैं या कुछ को डिजिटल सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ़्तार भी किया गया है.

उन पर कोविड-19 के बारे में झूठी जानकारी फैलाने या सरकार की आलोचना करने के आरोप लगाये गये हैं.

ऐसे ही मामले चीन, इंडोनेशिया, भारत, मलेशिया सहित अनेक देशों में भी देखने को मिले हैं.

मिशेल बाशेलेट ने कहा कि कम्बोडिया में यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय ने ऐसी गिरफ़्तारियों का लेखा-जोखा तैयार किया है.

आँकड़ों से मालूम हुआ कि एक 14 वर्षीय लड़की को महामारी के बारे में सोशल मीडिया पर अपनी राय रखने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि बहुत से लोगों को ‘झूठी ख़बरें (फ़ेक न्यूज़)’ या ‘ग़लत जानकारी’ फैलाने के आरोप में गिरफ़्तार किया, जबकि कुछ लोगों पर किसी अपराध को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए.

कुछ अन्य लोग सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश रचने के आरोप में भी गिरफ़्तार किये गये हैं.”

इस सत्र में भी चार विदेशी खिलाड़ियों को ही खेलने की अनुमति मिलेगी आई लीग में

नयी दिल्ली, 27 सितंबर (भाषा) अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) ने आई लीग क्लबों को मैच वाले दिन के लिए एक एशियाई सहित छह विदेशी खिलाड़ियों को टीम में रखने की अनुमति दे दी है लेकिन 29 अक्टूबर से शुरू होने वाले इस सत्र में भी क्लब अंतिम एकादश में केवल चार खिलाड़ियों (मौजूदा 3+1 नियम के अनुरूप) को ही रख पाएंगे।पिछले सत्र में आई लीग क्लबों को छह विदेशी खिलाड़ियों को पंजीकृत करने की अनुमति दी गई थी लेकिन एक एशियाई खिलाड़ी सहित केवल चार खिलाड़ियों को ही मैच में भाग लेने की अनुमति मिली थी।भारत के मुख्य कोच इगोर

पिछले सत्र में आई लीग क्लबों को छह विदेशी खिलाड़ियों को पंजीकृत करने की अनुमति दी गई थी लेकिन एक एशियाई खिलाड़ी सहित केवल चार खिलाड़ियों को ही मैच में भाग लेने की अनुमति मिली थी।

भारत के मुख्य कोच इगोर स्टिमैक घरेलू लीग में अधिक विदेशी खिलाड़ियों को रखने के पक्षधर नहीं हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे भारतीय खिलाड़ियों को कम मौके मिलेंगे।

एआईएफएफ ने लीग समिति की बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा,‘‘ लीग समिति ने मैच के लिए टीम में विदेशी खिलाड़ियों की संख्या बढ़ाकर छह (पांच खिलाड़ी विश्व के किसी भी भाग से जबकि एक खिलाड़ी एशिया से) कर दी है।’’

विज्ञप्ति में कहा गया है,‘‘ लेकिन इन छह खिलाड़ियों में से केवल चार खिलाड़ियों को ही अंतिम एकादश में रखा जा सकता है। इन खिलाड़ियों में तीन विश्व के किसी भी भाग से जबकि एक एशियाई खिलाड़ी शामिल होगा।’’

इसके अनुसार, ‘‘ किसी विदेशी खिलाड़ी के स्थानापन्न के रूप में अन्य विदेशी खिलाड़ी या भारतीय खिलाड़ी मैदान पर उतर सकता है। इसी तरह से एशियाई सत्र किसी एशियाई खिलाड़ी के स्थानापन्न के रूप में कोई एशियाई खिलाड़ी या भारतीय खिलाड़ी उतर सकता है।’’

बैठक की अध्यक्षता लीग समिति के नवनिर्वाचित प्रमुख लालनघिंग्लोवा हमर ने की, जो कार्यकारी समिति के सदस्य भी हैं। बैठक में महासचिव शाजी प्रभाकरन और उप महासचिव सुनंदो धर ने भी हिस्सा लिया।

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डॉलर की मजबूती और मंदी की आशंका से सहमे एशियाई बाजार, लंबा चल सकता है गिरावट का दौर

आज शुरुआती कारोबार में ही भारत सहित लगभग सभी एशियाई बाजार गिर गए हैं.

आज शुरुआती कारोबार में ही भारत सहित लगभग सभी एशियाई बाजार गिर गए हैं.

भारतीय शेयर बाजारों में बुधवार को लगातार छठे कारोबारी सत्र में गिरावट दिखी और सेंसेक्‍स खुलते ही 500 अंक टूट गया. जापान . अधिक पढ़ें

  • News18Hindi
  • Last Updated : September 28, 2022, 11:07 IST

हाइलाइट्स

जापान का निक्‍की 2.1% और दक्षिण कोरियाई शेयर बाजार 2.4% गिर गया है.
चीन के हालात भी कुछ अच्‍छे नहीं है. चीनी ब्लू चिप्स 0.6% गिरा है.
बीएसई सेंसेक्‍स बुधवार को खुलते ही 500 अंक टूट गया.

नई दिल्‍ली. एशियाई शेयर बाजार बुधवार 28 सितंबर को भी लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं. कई देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्‍याज दरों में बढ़ोतरी से मांग में कमी से मंदी आने की आशंका और डॉलर मजबूत होने से निवेशक शेयर बाजार से दूर हो रहे हैं. अमेरिका में बेकाबू महंगाई, ब्रिटेन सहित लगभग बड़े यूरोपिय देशों में खराब होते आर्थिक हालात भी एशियाई बाजारों के लिए विलेन बन गए हैं. आज शुरुआती कारोबार में ही भारत सहित लगभग सभी एशियाई बाजार गिर गए हैं.

बुधवार को भारतीय शेयर बाजारों में लगातार छठे कारोबारी सत्र में गिरावट दिखी और सेंसेक्‍स खुलते ही 500 अंक टूट गया.सुबह 9.28 बजे सेंसेक्‍स 519 अंकों के नुकसान के साथ 56,589 पर ट्रेडिंग कर रहा था, जबकि निफ्टी 159 अंक टूटकर 16,871 पर पहुंच गया. जापान का निक्‍की 2.1% और दक्षिण कोरियाई शेयर बाजार 2.4% गिरकर दो साल के निचले स्तर पर आ गए हैं. चीन के हालात भी कुछ अच्‍छे नहीं है. चीनी ब्लू चिप्स 0.6% गिरा है. वहीं, अमेरिकी एसएंडपी 500 वायदा 0.8% फिसल गया है. जबकि नैस्डैक वायदा 1.0% गिरा. S&P 500 लगातार 7 सत्रों गिर रहा है.

MSCI सूचकांक दो साल के निचले सत्र पर
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती ब्‍याज दरों और और धीमी वृद्धि दर शेयर बाजारों के लिए बहुत घातक है. जापान को छोड़कर एशिया-प्रशांत शेयरों का MSCI सूचकांक 1.7% गिरकर अप्रैल 2020 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया है. आज भी चीन का यूआन डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड लो पर चला गया है. वहीं, भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले 81.83 के रिकॉर्ड निचले स्‍तर पर चला गया है.

क्‍यों आ रही है गिरावट?
अमेरिकी बॉन्‍ड यील्‍ड के 4 फीसदी से ऊपर होने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्‍याज दरों में बढ़ोतरी करने की संभावना एशियाई बाजारों को उठने नहीं दे रही है. कैपिटल इकनोमिक्‍स में ग्‍लोबल इकनोमिक्‍स के हेड जेनिफर मेककैन का कहना है कि, “अब यह स्पष्ट हो गया है कि विकसित अर्थव्‍यवस्‍थाओं के केंद्रीय बैंक अपनी ब्‍याज दरों को बढ़ाएंगे और दरें तीन दशक के उच्‍चतम स्‍तर पर होंगी. अगले साल में हमें वैश्विक मंदी दिखेगी भी और यह महसूस भी होगी. इसलिए हम कह रहे हैं कि मंदी आ रही है.” मंदी की आशंका से निवेशक बुरी तरह डरे हुए हैं.

यूरोप के खराब हालात
जेपी मॉर्गन के विश्लेषकों ने एक नोट में कहा कि ब्रिटेन द्वारा अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव और इटली में सत्‍ता दक्षिणपंथी पार्टी के हाथ में आने से यूरोप के हालातों में फिलहाल सुधार आने की संभावना नहीं है. यूरोप में महंगाई उच्‍च स्‍तर पर है और यूरोपियन सॉवेरिन यील्‍ड भी दो साल के उच्‍च स्‍तर पर चली गई है. स्‍टर्लिंग और यूके बॉन्‍ड में गिरावट का भी नकारात्‍मक असर हो रहा है.

रेटिंग एजेंसी मूडीज के ब्रिटेन सरकार की कर कटौती को देश की अर्थव्‍यवस्‍था के लिए खतरनाक बताने के बाद स्टर्लिंग और दबाव में आ गया है. मूडीज का कहना है कि ब्रिटेन का यह कदम देश की क्रेडिट स्थिति के लिए नकारात्मक है. डॉयचे बैंक में एफएक्स रणनीति के वैश्विक प्रमुख जॉर्ज सरवेलोस ने कहा कि निवेशक चाहते हैं कि ब्रिटेन के घाटे का वित्‍तपोषण हो. बाजार चाहता है कि ब्रिटेन की मुद्रा में स्थिरता आए. अगर ऐसा नहीं होगा तो मुद्रा और गिरेगी, महंगाई बढ़ेगी जो और परेशानियां पैदा करेंगी.

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